उत्तराखंड: 26 साल में एक भी आईएएस अधिकारी की संपत्ति की जांच नहीं, आरटीआई ने खोली पोल
उत्तराखंड में पिछले 26 सालों से किसी भी आईएएस अधिकारी की संपत्ति की जांच का कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं ...और पढ़ें

यह तस्वीर एआई से बनाई घई है

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
किशोर जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड राज्य गठन की 26 साल में प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। वर्ष 2000 से लेकर अब तक के लंबे प्रशासनिक इतिहास में राज्य के शीर्ष पर बैठे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की संपत्तियों की जांच या स्क्रूटनी का एक भी आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया गया है।
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई एक बेहद अहम और दूरगामी परिणाम वाली जानकारी के जवाब में शासन के कार्मिक एवं सतर्कता अनुभाग की ओर से पांच अक्टूबर को जारी किए गए एक पत्र ने इस तथ्य पर आधिकारिक मुहर लगा दी है।
आरटीआइ ने उजागर किया चौंकाने वाला तथ्य हल्द्वानी के आरटीआई कार्यकर्ता रजत जोशी की ओर से 15 सितंबर को एक आवेदन दाखिल किया गया था। जिसमें अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 के नियम 16(5) के अंतर्गत पहली जनवरी 2001 से 31 अगस्त 2025 तक के दौरान राज्य कैडर के आईएएस अधिकारियों की चल और अचल परिसंपत्तियों की जांच के लिए शासन स्तर पर उठाए गए कदमों का ब्योरा मांगा गया था।
आवेदन के उत्तर में लोक सूचना अधिकारी एवं अनुभाग अधिकारी की ओर से बताया गया कि यह सूचना उनके कार्यालय में धारित (उपलब्ध) नहीं है। दरअसल राज्य में यूकेएसएसएससी व अन्य भर्ती घोटालों में समय-समय पर कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
हरिद्वार के चर्चित भूमि घोटालों के प्रकरण भी सुर्खियों में थे। इसके बाद भी शासन ने अपनी ही शक्तियों का उपयोग करते हुए एक भी आईएएस अधिकारी की संपत्त्ि0ि के स्रोतों की गहन जांच कराने की आवश्यकता महसूस क्यों नहीं की ?
घोटालों के बाद भी जांच नहीं
नियम 16 (5): वह शक्तिशाली कानूनी प्रावधान जिसका उपयोग फाइलों में ही दफन हो गया अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 का नियम 16 (5) देश के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारियों पर वितीय अनुशासन बनाए रखने के लिए सरकार को अत्यंत व्यापक और प्रभावी कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
इस नियम के तहत शासन किसी भी समय, चाहे वह सामान्य आदेश के जरिए हो या विशेष आदेश के जरिए, किसी भी अधिकारी को यह निर्देश दे सकता है कि वह निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपने, अपने पति-पत्नी या परिवार के किसी भी अन्य सदस्य के नाम पर अर्जित समस्त चल और अचल संपत्ति का पूरा ब्योरा प्रस्तुत करे।
इस प्रविधान न का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि लोक सेवकों की बनाई संपत्तियों के वित्तीय स्रोत पूरी तरह पारदर्शी और वैध हों, तथा आय से अधिक संपत्ति या भ्रष्टाचार के किसी भी संदेह पर तुरंत स्वतंत्र परीक्षण किया जा सके।
लेकिन विडंबना यह है कि उत्तराखंड जैसे नवोदित और संवेदनशील राज्य में इस कानूनी प्रावधान का उपयोग पिछले 26 वर्षों में 'शून्य' रहा है, जो प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्ट्राचार के निपटने की इच्छा शक्ति की कमी को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
राज्य में लोकायुक्त का पद 31 अक्टूबर 2013 को न्यायमूर्ति मदन मोहन घिल्डियाल के सेवानिवृत्त होने के बाद रिक्त है। लोकायुक्त अधिनियम के तहत लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतों की जांच की जा सकती है।
संपत्ति का आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक होना, बेनामी संपत्ति या भ्रष्टाचार से संबंधित विश्वसनीय सामग्री जांच का आधार बन सकती है। हरिद्वार भूमि खरीद घोटाले में नगर निगम द्वारा सराय क्षेत्र में भूमि खरीदने और भूमि के मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं की जांच हुई।
जिसमें तत्कालीन डीएम को निलंबित किया गया जबकि-तत्कालीन नगर आयुक्त की बर्खास्तगी की संस्तुति शासन को भेजी गई। जबकि ऊधमसिंह नगर में हुए एनएच-74 मुआवजा घोटाले में दो आइएएस सहित छह पीसीएस अधिकारियों का निलंबन किया गया।
यूकेएसएसएसएससी भर्ती घोटाला में तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक सहित आयोग के पूर्व सचिव, दो अपर निजी सचिव सहित तीन कर्मचारी निलंबित किए गए।राज्य में आइएएस के स्वीकृत 126 पदों में से 17 रिक्त हैं। पटवारी घोटाला सहित तमाम घोटालों में अधिकारियों पर निलंबन व बर्खास्तगी की कार्रवाई की गई लेकिन आज तक संपत्तियों की जांच नहीं की गई।
