सतेन्‍द्र डंडरियाल (जेएनएन) : धान की बेहतर पैदावार के लिए पानी की सर्वाधिक जरूरत होती है। लेकिन एक ऐसी तरकीब है जिसके तहत 70 फीसद पानी और 90 प्रतिशत मानव श्रम की बचत कर उच्‍छी उपज ली जा सकती है। अमूममन माना जाता है कि एक किलो धान उगाने के लिए कम से कम तीन से चार हजार लीटर पानी की जरूरती होती है, जबकि हर्बल हाइड्रोजन तकनीक में धान के बीज पर गोंद-कतीरे व गुड़ का लेप लगाकर बुआई करने से 70 प्रतिशत कम पानी में भी धान की खेती की जा सकती है।

 

प्रदेश में पहली बार इस तकनीक का सफल प्रयोग

करनाल रिसर्च सेंटर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर की तकनीक को नैनीताल जिले के गौलापार निवासी प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने इस बार अपनी पंद्रह बीघा भूमि में आजमाया तो लागत में कमी के साथ ही लगभग 90 प्रतिशत पानी की बचत हुई। खेती में हमेशा नए प्रयोग करने वाले प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा ने उत्तराखंड में पहली बार इस तकनीक का आजमा कर कम पानी में धान की खेती का सफल उदाहरण प्रस्तुत किया है।

उत्तराखंड में 87 प्रतिशत भाग असिंचित

प्रदेश में कुल कृषि क्षेत्रफल का 56 प्रतिशत भाग पर्वतीय कृषि के अंतर्गत आता है, लेकिन पहाड़ों में केवल 13 प्रतिशत भाग में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, शेष 87 प्रतिशत भाग असिंचित है, जिस वजह से पहाड़ों में धान का उत्पादन बहुत कम होता है। कम पानी वाले क्षेत्रों में धान उत्पादन की यह तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।

करनाल की तकनीक का प्रयोग

मेहरा ने वर्षा आधारित धान बीज पंत-12 में गोंद कतीरा तकनीक का प्रयोग किया। आमतौर पर पंत-12 बीज को पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विकसित किया गया है, जहां सिंचाई के साधनों की कमी है। मेहरा ने गौलापार में अपने 15 बीघा खेत में लगभग 40 किलो बीज बोया। जिसमें धान की सीधी बिजाई की इस नई तकनीक का इस्तेमाल कर प्राकृतिक (हाइड्रो जैल) गोंद कतीरा व गुड़ का प्रयोग किया। गोविंद वल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय के डायरेक्टर रिसर्च एसएन तिवारी ने उन्हें पंत-12 बीज लगाने के साथ ही हाइड्रो जैल तकनीक के इस्तेमाल करने की सलाह दी थी, जिसके बाद उन्होंने करनाल रिसर्च सेंटर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठार से संपर्क कर इस तकनीक को बारीकी से समझा और उनके मार्ग दर्शन में इसका प्रयोग किया।

गोंद कतीरा से ऐसे तैयार होता है बीज

50 किलोग्राम बीज के लिए एक लीटर उबले पानी में ढाई सौ ग्राम गुड़ व दो सौ ग्राम कीकर बबूल की गोंद या फिर गोंद कतीरा डालकर एक तार की चासनी बनाई जाती है, चासनी को ठंडा कर व छानकर धान के बीजों पर छिड़का जाता है। इससे बीजों की जलधारण क्षमता बढ़ जाती है। एक ग्राम गोंद कतीरा लगभग सौ एमएल पानी सोख लेता है। इसके बाद तैयार बीजों से बुआई की जा सकती है।

90 प्रतिशत पानी और 90 प्रतिशत मानव श्रम की बचत

किसान अधिक उत्पादन करने की बजाए लागत कम करने की नई तकनीक विकसित कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं। प्रगतिशील किसान नरेंद्र मेहरा मानते हैं कि जब-जब किसान ने बंपर पैदावार की उसे लागत भी नहीं मिली, इसी सोच को साकार करने के लिए मैंने धान की एक हेक्टेयर फसल की बुआई नई तकनीक विकसित करके की। जिसमें मात्र छह हजार रुपये खर्चा आया, जबकि आमतौर पर एक हेक्टेयर बुआई में 30-32 हजार रुपये की लागत आती है। वर्षा आधारित इस तकनीक में 90 प्रतिशत पानी और 90 प्रतिशत मानव श्रम की बचत होती है। गौंद कतीरा लेपित तकनीक पर्वतीय किसानों के लिए वरदान साबित होगी। गोंद कतीरे से खेती पंजाब, राजस्थान व हरियाणा के कम पानी वाले स्थानों पर की जा रही है।

इस तकनीक से मिलेंगे बेहतर परिणाम

डॉ. बीएस बिष्ट, अध्यक्ष उत्तराखंड राज्य कृषि परिषद एवं पूर्व कुलपति जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने बताया कि परंपरागत ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान को अपनाकर खेती की जाए तो निश्चित तौर पर परिणाम अच्छे आएंगे। गोंद कतीरा तकनीक से धान की खेती में लगभग 70 प्रतिशत पानी की बचत होगी।

क्या है गौंद कतीरा

अफ्रीका के जंगलों में पाई जाने वाली झाड़ी कतीरा से निकलने वाली गोंद है, जिसका गुण है वह अपने वजन से 100 गुना पानी को जमीन में संचित कर लेता है तथा आवश्यकतानुसार​ पौधों को पानी देता रहता है अतः वर्षा का पानी ही फसल के लिए पर्याप्त हो जाता है। अलग से सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है इस प्रकार सिंचाई का खर्च बच जाता है।

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Posted By: Skand Shukla