5000 किमी की उड़ान भरकर बर्फीले देशों से उत्तराखंड पहुंचे सुर्खाब, दिशाओं का अच्छा ज्ञान... भटकते नहीं रास्ता
रामनगर के कोसी बैराज और हाथीडगर जलाशय में हर साल की तरह इस बार भी बर्फीले देशों से सुर्खाब पक्षी पहुंचना शुरू हो गए हैं।

रामनगर के कोसी बैराज में पहुंचा सुर्खाब पक्षी। फोटो - प्रशांत कुमार।

समय कम है?
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जासं, रामनगर। वन्य जीवों के लिए प्रसिद्ध रामनगर बाघों की दहाड़ ही नहीं बल्कि विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का भी बसेरा स्थल है। विदेशों के पक्षी भी यहां के जलाशयों की शोभा बढ़ाते हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी सुर्खाब पक्षियों के जोड़े कोसी बैराज व हाथीडगर जलाशय में पहुंचना शुरू हो गए।
भीषण ठंड में भी अंडे नहीं दे सकते
तिब्बत, लददाख, रूस के साइबेरिया, ईरान के कैस्पियन व मंगोलिया, नेपाल के बर्फीले पहाड़ी क्षेत्रों में तापमान 40 से 50 डिग्री नीचे तक चले जाने से पानी के ऊपर कठोर बर्फ जाती है, जिससे पानी में रह पाते हैं। जिन मछली को वे खाते हैं, वे भी बर्फ जमने के कारण नहीं मिल पाती है। भीषण ठंड में भी यह अंडे नहीं दे सकते हैं।
क्योंकि अंडे सेकने के लिए गर्म तापमान चाहिए। इसलिए शीतकाल में यह भारत के अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों की ओर रूख करते हैं। देश के हिसाब से दूरियां लगभग एक हजार से पांच किलोमीटर तक होती है।अक्टूबर नवंबर तक यह भारत के अलग- अलग जगह में पहुंच जाते हैं और मार्च के बाद वतन वापसी करने लगते हैं।
पक्षी विशेषज्ञ महेंद्र पवार बताते हैं कि भारत के जलाशयों में पानी की कमी से भी इनकी प्रवास यात्रा व वासस्थल और भोजन की कमी होती है। जलाशयों के निकट खेती में कीटनाशक एवं रसायन के प्रयोग से कीड़े मकोड़े नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें यह प्रवासी पक्षी खाते हैं। जल्दी पहुंचने की वजह इनके इलाकों में जल्दी ठंड पड़ना वजह माना जाता है। रामनगर के कोसी बैराज, हाथीडगर क्षेत्र में नवंबर से लगभग 15 दिन पहले पहुंच गए हैं। वर्ष 2024 में कोसी बैराज में इनकी संख्या 422 व 2025 में 486 थी।
जोखिम भरी होती है भारत की यात्रा
प्रवासी पक्षी का भारत का सफर जौखिम भरा होता है। हजारों किलोमीटर के सफर में यह लगातार नहीं उड़ सकते। यह जलाशयों या झीलों पर सुस्ताने व पेट भरने के लिए रूकते हैं। उचित ठहराव न मिलने से कई पक्षी थकान व भूख से दम तोड़ देते हैं। यह जमीन से 22 हजार फीट से भी अधिक ऊंचाई तक उड़ान भरते हैं।
चार हजार मीटर से ऊपर जाते ही हवा में आक्सीजन का स्तर आधा हो जाता है। ऐसे में लगातार पंख फड़फड़ाते हुए आगे बढ़ना इनके फेफड़ों व मांसपेशियों के लिए कठिन होता है। रास्ते में इन्हें तेज विपरीत हवाओं व बर्फीले तूफानों का सामना करना होता है। हवाओं के विरुद्ध उड़ान में इन्हें अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है।
कोसी बैराज में सुर्खाब पक्षियों का पहुंचना यहां के पारिस्थतिकीय तंत्र के लिए अच्छा संकेत है। इन्हें शिकार से बचाने के लिए वन कर्मियों को नियमित गश्त के लिए कहा जाएगा। प्रयास रहेगा कि उस क्षेत्र की निगरानी होती रहे। इन्हें दिशाओं का अच्छा ज्ञान होता है, यह अपना रास्ता भी नहीं भटकते हैं। - अंकित बडोला, उप प्रभागीय वनाधिकारी रामनगर वन प्रभाग
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