रात होते ही अलग हो जाता है शापित सुर्खाब का जोड़ा, आसन रामसर साइट में 16 प्रजातियों के परिंदों का डेरा
आसन रामसर साइट पर सुर्खाब सहित 16 प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों का आगमन हुआ है, जिससे पर्यटन और गढ़वाल मंडल विकास निगम की आय में वृद्धि हुई है।

आसन रामसर साइट में प्रवास पर पहुंचे सुर्खाब व अन्य परिंदें धूप का आनंद लेते हुए। वन दारोगा
HighLights
आसन रामसर साइट में 16 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी आए।
सुर्खाब (रुडी शेलडक) की संख्या सर्वाधिक, अक्टूबर में आगमन।
शापित सुर्खाब जोड़ा रात में बिछड़ता, सुबह फिर मिलता।
राजेश पंवार, विकासनगर। देश के पहले कंजरवेशन रिजर्व और राज्य की पहली रामसर साइट आसन में सुर्खाब समेत 16 प्रजातियों के परिंदे उत्तराखंड के मेहमान बनकर पहुंचे हैं। ये प्रवासी परिंदे मार्च 27 के अंत तक यहां प्रवास पर रहेंगे। प्रवासी परिंदों के आगमन से गढ़वाल मंडल विकास निगम की आय में भी इजाफा हो रहा है। निगम की बोटिंग के माध्यम से पक्षी प्रेमी प्रवासी परिंदों को नजदीक से निहार रहे हैं।
परिंदों का आगमन सामान्यतः सात अक्टूबर से शुरू होता था, लेकिन इस बार सुर्खाब ने तीन अक्टूबर को ही डेरा डाल दिया। इसके बाद अन्य प्रजातियों के पक्षी पहुंचे। अब तक यहां करीब पांच सौ परिंदे आ चुके हैं, जिनमें सुर्खाब की संख्या सबसे अधिक है।
यहां रुडी शेलडक यानी सुर्खाब, लिटिल इग्रेट, ग्रेट इग्रेट, इंडियन स्पाटबिल्ड डक, कामन मोरहेन, ब्लैक विंग स्टील्ट, ग्रे हेरोन, वूली नेक्ड स्टार्क, कामन कूट, यूरेशियन विजन, गैडवाल, विस्टलिंग डक, रेड नेप्टड आइबीज, पर्पल हेरोन, पर्पल स्वाम्पहेन और रेड क्रेस्टेड पोचार्ड प्रजातियों के परिंदे डेरा डाल चुके हैं।
प्रवासी परिंदे उत्तराखंड की आय बढ़ाने में भी सहायक हैं। जब भी प्रवासी परिंदे आसन में आते हैं तो जीएमवीएन के आसन रिसोर्ट में आने वाले पर्यटक व पक्षी प्रेमी बोटिंग के माध्यम से परिंदों को नजदीक से निहारते व कैमरे में कैद करते हैं।
अक्टूबर से मार्च तक गढ़वाल मंडल विकास निगम की आय में काफी इजाफा होता है। आसन रेंजर आनंद सिंह रावत के अनुसार 16 प्रजातियों के परिंदे प्रवास पर आ गए हैं, रात दिन की गश्त जारी है।
दिन में सुर्खाब का जोड़ा रहता है साथ, रात में बिछुड़ जाता
रुडी शेलडक (सुर्खाब) को भारत में ब्राह्मणी बत्तख, चकवा चकवी भी कहा जाता है। यह बतख के आकार का नारंगी-भूरे रंग का पक्षी है। नर के गले में काली धारी होती है, जबकि मादा का सिर कुछ हल्के रंग का और सफेदपोश होता है। उसके गले में काली धारी नहीं होती।
वैसे तो सुर्खाब पक्षी को जोड़े में रहना पसंद है, लेकिन लोककथा के अनुसार शाप के कारण चकवा-चकवी रात में साथ नहीं रह पाते और पूरी रात अलग बिताते हैं। सुबह सूर्य की पहली किरण पड़ते ही शाप मुक्त होने पर उनका पुनर्मिलन होता है।
साहित्यकार हेमचंद सकलानी के अनुसार, साहित्य और बोलचाल में सुर्खाब के पर लगना मुहावरा है, जिसका अर्थ किसी में खास गुण होना है। संस्कृत और प्राचीन भारतीय साहित्य में सुर्खाब को ‘चक्रवाक’ या ‘चकवा-चकवी’ कहा गया है। हिंदू साहित्य, कालिदास की रचनाओं और भक्तिकालीन कविता में इन्हें प्रेम और विरह का प्रतीक माना गया है।
