नैनीताल में किंग कोबरा का अनोखा संसार, मां भूखी रहकर करती है रक्षा, अंडे से निकलते ही बच्चे पीते हैं पानी
नैनीताल किंग कोबरा के लिए सबसे सुरक्षित स्थान बन गया है। एक शोध में सामने आया है कि मादा कोबरा 70-75 दिन तक भूखी रहकर बच्चों की रक्षा करती है।

प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।
HighLights
नैनीताल किंग कोबरा के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह।
मादा किंग कोबरा 70-75 दिन भूखी रहकर बच्चों की रक्षा करती।
उत्तराखंड किंग कोबरा का डीएनए पश्चिमी घाट से भिन्न।
ललित मोहन बेलवाल, नैनीताल। किंग कोबरा के लिए नैनीताल सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन चुका है। प्रदेश में किंग कोबरा सबसे ज्यादा नैनीताल जिले में ही नजर आया। खास बात यह है कि यहां के किंग कोबरा का डीएनए पश्चिम घाट से अलग मिला।
दरअसल, उत्तराखंड वन विभाग के अनुसंधान केंद्र ने 2020 में किंग कोबरा पर शोध शुरू करवाया। इस दौरान सांपों के इस बादशाह के बारे में कई तथ्य सामने आए। शोध में सामने आया है कि किंग कोबरा के लिए सबसे बड़ा खतरा गाड़ियों की आवाजाही है। वर्ष 2022 से 2024 के बीच पांच किंग कोबरा की वाहनों से कुचले जाने से मौत हो गई।
वहीं किंग कोबरा के बच्चों पर येलो थ्रोटेड मार्टेन (कुन्स्याऊ), गिद्ध व बाज का खतरा भी रहता है। यही वजह है कि मादा किंग कोबरा अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए घोंसले में 70 से 75 दिन भूखी रहती है। यही नहीं वह अपनी ऊर्जा को बचाने के लिए बहुत कम हिलती-डुलती है।
86 प्रतिशत घोंसले चीड़ की पत्तियों से तैयार मिले
शोध में यह भी सामने आया है कि लगभग 86 प्रतिशत मामलों में किंग कोबरा के घोंसले चीड़ की पत्तियों (पिरुल) से बने हैं। इससे किंग कोबरा को जरूरत के मुताबिक गर्मी मिलती है। साथ ही पिरुल से निकलने वाला रेजिन एंटीबायोटिक और एंटी फंगल भी होता है। संभवत: इसी वजह से किंग कोबरा पिरुल को घोंसला बनाने के लिए चुनता है। नैनीताल जिले के नथुवाखान क्षेत्र के जंगलों में मिले घोंसले बांज के पत्तों के बीच भी मिल थे। यह किंग कोबरा की अनुकूलन क्षमता का सुबूत है।
जंगल की आग भी है बड़ा खतरा
किंग कोबरा का घोंसला बनाने का सीजन मई और जून में होता है। यही समय फायर सीजन का भी होता है। चूंकि पिरुल तेजी से आग पकड़ता है, ऐसे में किंग कोबरा के लिए पिरुल खतरा भी बन जाता है।
शोध के दौरान यह भी सामने आया कि किंग कोबरा अपने घोंसले पानी के स्रोत के बिल्कुल पास बनाता है, क्योंकि उसके बच्चे अंडे से निकलने के बाद सबसे पहले पानी पीते हैं। चूंकि पानी के स्रोत के पास आमतौर पर नमी रहती है, इसलिए इस तरह के प्रत्यक्ष मामले नहीं दिखे, जहां वनाग्नि के चलते किंग कोबरा को नुकसान पहुंचा हो।
पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले किंग कोबरा से है अलग
उत्तराखंड में पाए जाने वाले किंग कोबरा को लेकर यह तथ्य सामने आया कि दोनों जगहों पर पाए जाने वाले किंग कोबरा अलग-अलग हैं। जहां पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले किंग कोबरा की लंबाई 12 से 14 फीट होती है, वहीं उत्तराखंड में पाए जाने वाला किंग कोबरा औसतन 10 से 12 फीट लंबा पाया गया। दोनों जगहों पर पाए जाने वाले किंग कोबरा का डीएनए भी अलग-अलग है। यही वजह है कि उत्तराखंड में पाए जाने वाले किंग कोबरा की प्रजाति को ओफियोफैगस हन्ना और पश्चिमी घाट वाले को ओफियोफैगस कालिंगा नाम दिया गया।
