चंपावत के लोहाघाट में देवडांगरों की नंगे पांव यात्रा: सदियों से जारी आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक
उत्तराखंड के लोहाघाट में शारदीय नवरात्र के दौरान 12 गांवों के देवडांगर नंगे पांव ऋषेश्वर महादेव मंदिर तक यात्रा करते ...और पढ़ें
किशोर जोशी, नैनीताल। देवभूमि उत्तराखंड में लोक देवताओं को प्रसन्न करने के लिए धार्मिक यात्राओं का आयोजन सदियों से होता रहा है। यह लोकदेवताओं की शक्ति का ही असर है कि नौकरी के लिए पलायन कर चुके ग्रामीण कभी कभार गांव आते हैं तो लोकदेवता अथवा कुल देवता के दरबार में हाजिरी लगाना नहीं भूलते।

परंपराओं की कड़ी में शारदीय नवरात्र की एक खास परंपरा है भक्तों के हुजूम के साथ लोहाघाट में 12 गांवों के देव डांगरों की नंगे पांव पैदल यात्रा। आधुनिकता के इस दौर में भी यह यात्रा बेरोकटोक आस्था व विश्वास के साथ जारी है।
चंपावत जिले के लोहाघाट कस्बे के आसपास के क्षेत्रों के एक दर्जन गांव लोक देवता या देव डांगर परंपरागत पोशाक व हाथों में देव उपकरणों के साथ ऋषेश्वर व कालशन को पूजने के लिए हर साल शारदीय नवरात्र की महाष्टमी पर ऋषेश्वर महादेव मंदिर तक मिलों दूरी की पदयात्रा करते हैं।
मंदिर के पूजन की ओर से देव डांगरों को जल व दूध से स्नान के बाद यात्रा का समापन होता है। डांगरों से टीका लगाने व आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए पूरा मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहता है।
12 गांवों के लोगों की यह धार्मिक यात्रा ग्रामीणों को सामाजिक एकता के सूत्र में दशकों से बांधे है। यात्रा में शामिल गांवों में शिव के अवतार काल्सन, ऋषेश्वर कुल देवता के रुप में पूजे जाते हैं।
लोहाघाट रिषेश्वर मंदिर में
भुमलाई गांव के पुरोहित व कलीगांव के पुजारी देवडांगरों को जल व दूध से स्नान कराते हैं। जबकि जलते हुए दीये को मुंह में बुझाने के बाद डांगर शांत हो जाते हैं।
जब अंग्रेज को देना पड़ा दंड
गंगनौला के पूर्व प्रधान ललित मोहन जोशी बताते हैं कि करीब सौ साल पहले जब कलीगांव के ग्रामीण लोक देवता की जय जयकार के साथ डांगरों को स्नान कराने जा रहे थे तो हथरंगिया में साल्ट नामक अंग्रेज ने सड़क को गेट लगाकर बंद कर यात्रा रोक दी।
तभी अवतरित डांगर ने अक्षत मारकर गेट का ताला खोला, इसके बाद अंग्रेज बीमार हो गया। जब वह ठीक नहीं हुआ तो डांगरों की शरण में पहुंचा। इसके बाद साल्ट ने दंड स्वरुप चांदी का टोप लोकदेवताओं को अर्पित किया। आज भी कलीगांव के जत्थे में शामिल ऋषेश्वर मंदिर के पुजारी उसी चांदी के टोप को पहनकर यात्रा में शामिल होते हैं।
इन गांवों से आते हैं देव डांगर
कलीगांव, राईकोट, बंदेलाढेक, सिरमोली, रायनगर चौड़ी, बनगांव, डेंसली, इड़ाकोट, भुमलाई, गंगनौला-चनोड़ा, खतेड़ा-नसखोला व चामी।
एक दिन पहले से होती हैं तैयारियां
यात्रा के लिए सभी 12 गांवों में सप्तमी से मंदिर में रात्रि जागरण के साथ ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। महाष्टमी के दिन सुबह ऋषेश्वर-कालेशन मंदिर में पूजा अर्चना के साथ डंगरिये देव अस्त्र, कालेशन का कटारा, त्रिशूल के अलावा तांबे की डलिया, शंख, हर घर से मिलने वाले चढ़ावे के दूध के लिए तांबे अथवा कांसे का गडुवा मंदिर से निकालते हैं।
डांगर परंपरागत कठिन रास्तों से घर-घर जाते हैं। हर घर से गाय का दूध व नया अनाज एकत्र कर ऋषेश्वर मंदिर में चढ़ाया जाता है। महाअष्टमी के बाद इन गांवों में रिषेश्वर के प्रतिनिधि जाते हैं और हर घर से देवता को चढ़ावा के तौर पर अनाज के अलावा अक्षत, फूल, भेंट लेकर आते हैं। अब पहाड़ में खेतीबाड़ी सिमटी तो अधिकांश ग्रामीण अनाज के स्थान पर अक्षत, फूल व नाली अनाज के बदले भेंट देते हैं।
