जागरण विमर्श: बिजली के स्रोत के रूप में नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है उत्तराखंड- विष्णु प्रकाश त्रिपाठी
दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि उत्तराखंड को केवल बिजली के स्रोत के बजाय आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए।

जागरण विमर्श कार्यक्रम में चर्चा करते कार्यकारी संपादक विष्णु त्रिपाठी । जागरण

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, हल्द्वानी । उत्तराखंड को केवल बिजली के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र के रूप में देखना चाहिए। भारतीय संस्कृति में ऊर्जा का एक व्यापक आध्यात्मिक अर्थ है और उत्तराखंड इस ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है। उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान को समझे बिना विकास की अवधारणा को अधूरी है।
देवभूमि में चारधाम और प्रमुख नदियों के उद्गम क्षेत्र होने के कारण यहां की आध्यात्मिक ऊर्जा को समझना आवश्यक है। यह कहना है दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी का। वह शुक्रवार को होटल फार्च्यून में आयोजित ''विमर्श का नवनीत'' विषय पर आयोजित जागरण विमर्श में बोल रहे थे।
उतराखंड : आशाएं व चुनौतियों पर केंद्रित चार सत्रों में राजनीति, प्रकृति, पहाड़, प्रशासन, विकास, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं पर संवाद हुआ। इन विषयों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लेकर कैबिनेट मंत्री, ब्यूरोक्रेट, विज्ञानी तक ने समग्र वार्ता की।
यह भी पढ़ें- जागरण विमर्शः बदलती जरूरतों और चुनौतियाें के बीच विकास पथ पर बढ़ा उत्तराखंड: सीएम धामी
धार्मिक पर्यटन अशुद्ध शब्द
अंतिम सत्र में इस विमर्श के निष्कर्ष पर बातचीत करते हुए कार्यकारी संपादक ने कहा कि धार्मिक पर्यटन अशुद्ध शब्द है। जबकि पर्यटन, देशाटन व तीर्थाटन होता है। पर्यटन जहां हम रहते हैं उससे अलग जगह पर जाना, देशाटन का तात्पर्य हमारे देश की जगहों पर घूमना और तीर्थाटन का मतलब अपने तीर्थों में जाना है। इसलिए शब्दों के अंतर को समझना चाहिए। यह संस्कार को परिभाषित करता है। उन्होंने कहा कि ''जेन जी'' जैसे शब्दों पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ये शब्द युवाओं की संभावनाओं को सीमित करते हैं।
भारतीय संस्कृति में पीढ़ियों को इस तरह के वर्गीकरण के आधार पर देखने की कोई अवधारणा नहीं है। साथ ही उन्होंने उत्तराखंड के विकास के लिए प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। आरक्षण पर भी उन्होंने स्पष्ट किया कि आरक्षण केवल सरकारी नौकरी के लिए दिया गया, जबकि ऐसा करना केवल आरक्षण देकर नौकर बनाना था।
यह भी पढ़ें- जागरण विमर्शः उत्तराखंड में कृषि बागवानी से स्वरोजगार की राहेंः प्रो अजय कुमार
राज्य संपादक मनोज झा ने कहा कि उत्तराखंड के मूल निवासियों ने सदियों से वन्य जीवों के साथ जीवन व्यतीत किया है। इस आदत को हमने आधुनिक विकास और शहरीकरण आड़ में भुला दिया है। इसे आप किस तरीके से देखते हैं। इस पर विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि पलायन को संभावनाओं की खोज के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बाहर जाकर शिक्षा प्राप्त करना पलायन नहीं, बल्कि विकास है। इसके लिए उत्तराखंड की मूल पहचान को समझा जाना चाहिए। तभी विकास की दिशा स्पष्ट होगी।
