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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 18, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

World Heritage Day 2022 : देहरादून के दिल की धड़कन 'घंटाघर', शीर्ष पर लगी छह घड़ियां इसे बनाती हैं खास

By Nirmala BohraEdited By:
Published: Mon, 18 Apr 2022 01:32 PM (IST)Updated: Mon, 18 Apr 2022 01:43 PM (IST)

World Heritage Day 2022 घंटाघर देहरादून की धड़कन है। 24 जुलाई 1948 को तत्‍कालीन राज्यपाल सरोजनी नायडू ने इस घंटाघर ...और पढ़ें

यह एशिया में अपनी तरह का दुर्लभ घंटाघर है
यह एशिया में अपनी तरह का दुर्लभ घंटाघर है

जागरण संवाददाता, देहरादून : देहरादून स्थित घंटाघर शहर की पहचान होने के साथ ही यहां की धड़कन भी है। शहर के बीच में मौजूद इस घंटाघर के शीर्ष पर छह घड़ियां लगी हुई हैं। जो इसे खास हो बनाती हैं। शीर्ष पर छह घडि़या लगी होने से यह एशिया में अपनी तरह का दुर्लभ घंटाघर है।

सरोजनी नायडू ने घंटाघर का शिलान्यास किया

अंग्रेजी शासनकाल के न्यायाधीश लाला बलबीर सिंह की याद में उनके पुत्र कुंवर आनन्द सिंह ने सन 1948 में घंटाघर का निर्माण कराया था। नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष आनन्द स्वरूप गर्ग इसके पक्षधर थे।

इसलिए उन्होंने कुंवर आनन्द सिंह को सुझाव दिया कि अगर तत्‍कालीन राज्यपाल सरोजनी नायडू घंटाघर के शिलान्यास की स्वीकृति दे दें तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्‍होंने ऐसा ही किया और सरोजनी नायडू ने स्‍वीकृति दे दी।

24 जुलाई 1948 को सरोजनी नायडू ने इस घंटाघर का शिलान्यास किया। घंटाघर के निर्माता कुंवर आनन्द सिंह ने घंटाघर को बनाने के लिए परिवार के सदस्यों का सहयोग लिया, जिनका का उल्लेख वहां मौजूद शिलालेख में मिलता है।

तत्कालीन यातायात मंत्री लाल बहादुर शास्त्री  ने किया था उद्घाटन

घंटाघर का उद्घाटन 1953 के अक्टूबर माह में तत्कालीन यातायात मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कर कमलों द्वारा किया गया था।

घंटाघर ईंटो और पत्थरों से बना हुआ है। इसमें प्रवेश के लिये छह दरवाजे हैं। इसके षट्कोणीय आकार की हर दीवार पर प्रवेशमार्ग है। ऊपर जाने के लिये गोल घुमावदार सीढ़ी है।

सीढ़ियां चढ़कर ऊपरी तल पर जाया जा सकता है। घंटाघर में जो छह घड़ियां लगी हैं उन्‍हें उस समय स्वीटजरलेंड से भारी-भरकम मशीनों द्वारा लाया गया था। आज इसकी घड़ियां बदल कर इलेक्ट्रानिक घड़ियां लग गयी हैं।

इसलिए अनूठा है यह स्‍मारक

यह स्मारक इस लिहाज से भी अनूठा है, क्‍योंकि अंग्रेजों ने जो घंटाघर बनाए वे दो या चार घड़ियों वाले हैं, जबकि देहरादून का घंटाघर छह घड़ियों वाला है।

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