कितनी गहरी है उत्तराखंड की सबसे संवेदनशील ग्लेशियर झील? विज्ञानियों ने खोला रहस्य, लगा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम
वसुंधरा ताल में राज्य का पहला सेंसर-आधारित ग्लेशियर झील अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित कर दिया गया है। बता दें कि ...और पढ़ें


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राज्य ब्यूरो, देहरादून। हिमनद झीलों से उत्पन्न ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) के खतरों की निगरानी और चेतावनी जारी करने की दिशा में उत्तराखंड ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। चमोली जिले में लगभग 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिमनद झील वसुंधरा ताल में सेंसर आधारित प्रदेश का पहला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित कर दिया गया है।
यह कार्य पूरा कर लौटे विज्ञानियों व विशेषज्ञों के दल का मंगलवार को आइटी पार्क स्थित यूएसडीएमए में आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन और सीबीआरआइ के निदेशक प्रो.आर प्रदीप कुमार ने स्वागत किया।
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इस मौके पर विज्ञानियों ने बताया कि वसुंधरा ताल की गहराई 38.50 मीटर है, जबकि चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। पूर्व के आंकड़ों और वर्तमान स्थिति के अनुसार झील के आकार में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला है।
सीबीआरआइ रुड़की ने बनाया अर्ली वॉर्निंग सिस्टम
केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआइ) रुड़की ने यह अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित किया है। इसकी स्थापना के लिए सीबीआरआइ के साथ ही वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों व तकनीकी विशेषज्ञों के दल को 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने वसुंधरा ताल के लिए रवाना किया था।
अपना मिशन पूरा कर लौटे विज्ञानियों के दल ने मंगलवार को सिस्टम की स्थापना से लेकर उससे मिलने वाले आंकड़ों और अलर्ट जारी करने की प्रक्रिया की जानकारी साझा की।
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सेंसर से होगी झील व आसपास के क्षेत्र की निगरानी
विज्ञानियों ने बताया कि वसुंधरा ताल में आल-इन-वन मौसम सेंसर लगाया गया है, जो हवा की गति व दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान व वायुदाब से संबंधित आंकड़े मापेगा।
झील के जलस्तर की निगरानी को फ्लोटिंग सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर, संभावित बाढ़ के प्रभाव से उत्पन्न तात्कालिक कंपन, झुकाव एवं भू-गतिविधियों की निगरानी को दो एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर, हिमस्खलन पर निगरानी को अतिरिक्त एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर, बर्फ की गहराई मापने को स्नो डेप्थ सेंसर, बर्फ की सतह के नीचे विभिन्न गहराइयों पर तापमान मापने को सात तापमान सेंसर तथा झील की सतह के तापमान की निगरानी को सेंसर लगाए गए हैं।
हर दो घंटे में पहुंचेगा डाटा
अभियान दल के प्रमुख एवं सीबीआरआई के वैज्ञानिक डा. डीपी कानूनगो ने बताया कि अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की स्थापना में क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम और उपकरणों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्य किए गए।
प्रणाली के लिए स्थापित सेंसर सामान्य परिस्थितियों में प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े सीबीआरआई व यूएसडीएमए में स्थापित डैशबोर्ड पर भेजेंगे। किसी भी आपात स्थिति में निर्धारित दो घंटे के अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना सेंसर तत्काल आंकड़े भेज सकेंगे, जिससे संभावित असामान्य परिस्थितियों की समय रहते पहचान करने में सहायता मिलेगी।
इरिडियम उपग्रह संचार से जुड़े उपकरण
मोबाइल नेटवर्क की उपलब्धता के लिए इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का उपयोग किया गया है। अभियान दल के मुताबिक सभी सेंसर से अपेक्षानुसार आंकड़े मिल रहे है। निर्बाध विद्युत आपूर्ति के लिए 280 एंपीयर क्षमता की सौर पैनल आधारित बैटरी लगाई गई है, जो लगभग 10 दिन का बैकअप देने में सक्षम है।
उपकरणों की स्थापना को स्टील के माडयूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया। क्षेत्र में हवा की गति 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा की गति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
