ग्लेशियर झीलें उत्तराखंड में आपदा की नई चुनौती, 344 में से 13 बेहद जोखिमपूर्ण
उत्तराखंड में हिमालय के बदलते पर्यावरण से ग्लेशियर झीलें नई आपदा का खतरा बन रही हैं, जहां 344 में से 13 झीलें जोखिमपूर्ण चिह्नित की गई हैं।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
केदार दत्त, देहरादून। उत्तराखंड में भी हिमालय का तेजी से बदलता पर्यावरण ग्लेशियर झीलों के माध्यम से नई आपदा की आहट लेकर आया है। ग्लेशियरों के पीछे हटने, टूटने और झीलों के आकार में बदलाव के साथ ही इनके फटने के कारण बढ़ते खतरे ने चिंता और चुनौती, दोनों बढ़ा दी हैं।
नेपाल की हालिया विनाशकारी आपदा इस चुनौती को और गंभीर बना रही है। हालांकि, इस परिदृश्य के बीच उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और संभावित आपदा से निबटने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में कवायद होती दिख रही है, लेकिन जरूरत इस मुहिम को बेहद गंभीरता और तेजी से आगे बढ़ाने की है।
बन सकती हैं नेपाल की तरह तबाही का सबब
ग्लेशियर झीलों का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि हिमालय केवल उत्तराखंड की भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि यहां की नदियों, जलस्रोतों और पारिस्थितिकी का आधार भी है। ग्लोबल वार्मिग के दौर में हिमालयी क्षेत्र में हो रहे बदलावों ने आपदा के स्वरूप और जोखिम को भी बदल दिया है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र में 344 ग्लेशियर झीलें चिह्नित की गई हैं। इनमें से 13 झीलों को जोखिमपूर्ण माना गया है। यानी ये नेपाल की तरह तबाही का सबब बन सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते वैश्विक तापक्रम के प्रभाव से हिमालयी क्षेत्र भी अछूता नहीं है। ग्लेशियरों का टूटना और ग्लेशियर झीलों में बदलाव या फटना इसी का नतीजा है। फिर उत्तराखंड तो इस लिहाज से बेहद संवेदनशील है।
यहां कोई ग्लेशियर झील टूटती है तो उसके पानी व मलबे का बहाव निचले क्षेत्रों में क्षति का कारण बनता है। राज्य पहले भी हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली इस तरह की आपदाओं का सामना कर चुका है। केदारनाथ, रैणी और धराली आपदाओं ने यह स्पष्ट किया है कि पहाड़ में प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
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झील टूटी तो कहां तक पहुंचेगा पानी, बनेगा रूटमैप
नेपाल की आपदा के बाद भारत के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के खतरे को लेकर केंद्र सरकार भी सतर्क हुई है। इसी कड़ी में उसने हिमालयी राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन्हीं के अनुरूप ग्लेशियर झीलों को लेकर आगे की कार्ययोजना बनेगी। इसमें सबसे महत्वपूर्ण ग्लेशियर झीलों के जोखिम वाले क्षेत्रों का रूटमैप मैप तैयार करना है।
इससे यह आकलन करने में मदद मिलेगी कि किसी ग्लेशियर झील के फटने पर बाढ़ का पानी किस दिशा में और कितनी दूरी तक पहुंच सकता है। इसके आधार पर संवेदनशील गांवों, बस्तियों, सड़क व पुल जैसी महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाओं की पहचान कर आपदा की स्थिति में बचाव और राहत की योजना पहले से तैयार की जा सकेगी। आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार केंद्र के दिशा-निर्देशों के अनुरूप राज्य में भी कदम उठाए जाएंगे।
निगरानी से लेकर चेतावनी तक समन्वित व्यवस्था
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी केवल उनके आकार या जलस्तर तक सीमित नहीं रहेगी। संभावित खतरे को देखते हुए निगरानी, वैज्ञानिक आकलन, जोखिम मानचित्रण और अर्ली वार्निंग को एक समन्वित तंत्र से जोड़ने की जरूरत महसूस की जा रही है। समय रहते खतरे का संकेत मिलने पर नदी घाटियों में बसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा।
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उत्तराखंड झेल चुका है दंश
- केदारनाथ आपदा : 16-17 जून 2013 को केदारनाथ मंदिर के ठीक ऊपर चौराबाड़ी झील टूटने के कारण आई आपदा ने लगभग 6,000 लोगों की जान ले ली थी। इससे केदारघाटी में भारी तबाही हुई थी।
- रैणी आपदा :सात फरवरी 2021 को चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से ऋषिगंगा और धौलीगंगा में आए उफान ने रैणी में पावर हाउस प्रोजेक्ट को तहस-नहस कर दिया था। आपदा में 200 से अधिक लोग काल-कवलित हुए।
- धराली आपदा : पांच अगस्त 2025 को उत्तरकाशी जिले में खीरगंगा के रास्ते आई तबाही ने धराली कस्बे को मलबे में तब्दील कर दिया था। इसमें भी जान-माल की बड़े पैमाने पर क्षति हुई।
उत्तराखंड में ग्लेशियर झील
- जिला, संख्या
- चमोली, 192
- उत्तरकाशी, 83
- पिथौरागढ़, 40
- रुद्रप्रयाग, 11
- टिहरी, 10
- बागेश्वर, 08
ये झीलें ज्यादा खतरनाक
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने राज्य में 13 ग्लेशियर झीलों को अधिक जोखिमपूर्ण श्रेणी में रखा है। इनमें पिथौरागढ़ की छह, चमोली की चार और बागेश्वर, टिहरी व उत्तरकाशी की एक-एक झील है।
इनमें से अब तक पिथौरागढ़ की मबांग झील का ग्लेशियोलाजिकल और चमोली के वसुंधरा ताल, पिथौरागढ़ की स्यूंतियांक्ति और प्युंगरु झील का बाथीमेट्री ग्लेशियोलाजिकल अध्ययन कराने के साथ ही चारों झीलों का विशेष वैज्ञानिक सर्वेक्षण भी कराया जा चुका है।
बोले विशेषज्ञ
'ग्लोबल वार्मिंग में हमारी भागीदारी नगण्य है, लेकिन फिर भी हिमालय और हिमालयवासियों को इसका दंश झेलना पड़ रहा है। वर्षा व बर्फबारी का पैटर्न बदल गया है। ग्लेशियर झीलों का खतरा बढ़ा है। इसे देखते हुए जहां-जहां भी ग्लेशियर झीलें हैं, उनके प्रभाव क्षेत्र का आकलन कर निचले क्षेत्रों के लिए सेटलमेंट का डिजाइन तैयार किया जाना चाहिए।' - पद्मभूषण डा.अनिल प्रकाश जोशी, संस्थापक हेस्को।
'भारतीय हिमालयी क्षेत्र ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) की दृष्टि से संवेदनशील है। हमारी खड़ी घाटियों को देखते हुए बाढ की लहर हमें प्रतिक्रिया देने के लिए घंटे नहीं देगी, यह कुछ मिनटों की बात हो सकती है। हमारी बस्तियां, जलविद्युत परियोजनाएं और तीर्थयात्रा मार्ग नीचे की ओर हैं। ऐसे में उत्तराखंड के लिए निरंतर निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली वैकल्पिक नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है।' -राजेंद्र सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, एनडीएमए
