उत्तराखंड में धड़ल्ले से चल रही ‘मौत की फैक्ट्री’, नकली दवाओं के बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़
एसटीएफ ने उत्तराखंड में नकली दवाओं के बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जहां गंभीर बीमारियों की नकली दवाएं बन ...और पढ़ें

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

समय कम है?
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अंकुर अग्रवाल, देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की पहचान कभी आयुर्वेद, जड़ी-बूटियों और स्वास्थ्य पर्यटन से होती थी, लेकिन अब वही राज्य धीरे-धीरे नकली दवाओं के नेटवर्क का सुरक्षित ठिकाना बनता जा रहा है।
हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कैंसर, ब्लड प्रेशर, संक्रमण, गठिया और मिर्गी जैसी गंभीर बीमारियों की नकली दवाएं यहां तैयार होकर देशभर में बेची जा रही हैं।
नामी कंपनियों की हूबहू दवाएं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा नेटवर्क वर्षों से सक्रिय है, लेकिन हर बार इसका राजफाश स्वास्थ्य विभाग या ड्रग विभाग नहीं, बल्कि एसटीएफ और पुलिस कर रही है। इससे सरकारी निगरानी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
ताजा मामले में एसटीएफ ने फेसबुक पेज के जरिये कंपनियों की नकली दवाएं बेचने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया। जांच में सामने आया कि रुड़की, भगवानपुर और कोटद्वार की फैक्ट्रियों में नामी कंपनियों की हूबहू दवाएं तैयार की जा रही थीं और उन्हें बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ तक सप्लाई किया जा रहा था।
गिरोह इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक पर ‘एसके हेल्थ केयर’ नाम से पेज बना ब्रांडेड दवाओं की तस्वीरें डालता था और उन्हें बाजार से आधे दाम पर बेचता था। एसटीएफ ने खुद ग्राहक बनकर दवाइयां मंगवाईं और जांच में वे नकली निकलीं। इनमें कैंसररोधी दवाओं से लेकर ब्लड प्रेशर, दर्द, संक्रमण और मिर्गी में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल थीं। यानी मरीज इलाज नहीं, बल्कि ‘धीमा जहर’ खरीद रहे थे।
फार्मा हब की आड़ में बढ़ा फर्जी कारोबार
सरकार ने उत्तराखंड को फार्मा हब बनाने के लिए उद्योगों को जमीन, टैक्स छूट और सुविधाएं दीं। हरिद्वार, रुड़की, भगवानपुर, सेलाकुई और कोटद्वार जैसे क्षेत्रों में दवा उद्योग तेजी से बढ़े, लेकिन इन्हीं औद्योगिक क्षेत्रों में नकली दवा सिंडिकेट भी पनप गया।
फर्जी रैपर, नकली क्यूआर कोड, डुप्लीकेट पैकिंग और ब्रांडेड कंपनियों के हूबहू लेबल तैयार किए जा रहे थे। एसटीएफ की जांच में सामने आया कि कुछ फैक्ट्रियां कागजों में बंद थीं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें खोलकर नकली दवा बनाई जाती थी। यानी पूरा नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से संचालित हो रहा था।
हर बार एसटीएफ सक्रिय, ड्रग विभाग निष्क्रिय
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इतनी बड़ी मात्रा में नकली दवाएं बन रही थीं और देशभर में सप्लाई हो रही थीं, तब ड्रग विभाग आखिर क्या कर रहा था? नियमित निरीक्षण, सैंपलिंग व निगरानी की जिम्मेदारी ड्रग विभाग की है।
इसके बावजूद बार-बार नकली दवा फैक्ट्रियां पकड़ी जा रही हैं। रुड़की और हरिद्वार क्षेत्र में पहले भी कई बार नकली दवा निर्माण पकड़ा जा चुका है। कुछ फैक्ट्रियां सील हुईं, मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन कुछ समय बाद फिर नया नेटवर्क सक्रिय हो गया।
बड़ा सवाल: कितने मरीज प्रभावित हुए?
अब तक किसी एजेंसी ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि कितने मरीजों तक ये दवाएं पहुंचीं व कितने मेडिकल स्टोर इनके संपर्क में थे। कितने अस्पतालों में यह सप्लाई हुईं व कितने लोगों की सेहत इससे प्रभावित हुई। यदि खाद्य पदार्थ में मिलावट मिले तो सार्वजनिक अलर्ट जारी होता है, लेकिन नकली दवा पकड़े जाने के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से शायद ही कभी जनता को चेतावनी दी जाती हो।
अब सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, सिस्टम की सर्जरी जरूरी
विशेषज्ञ मानते हैं कि नकली दवा का कारोबार सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सुनियोजित ‘साइलेंट किलिंग’ है। जरूरत है राज्यभर की फार्मा यूनिट्स के विशेष आडिट, ड्रग इंस्पेक्टरों की जवाबदेही तय करने, आनलाइन दवा बिक्री की निगरानी, सप्लाई चैन और वित्तीय नेटवर्क की जांच और उन अधिकारियों की भूमिका खंगालने की, जिनके क्षेत्रों में यह नेटवर्क फलता-फूलता रहा। क्योंकि यदि सिस्टम की मिलीभगत नहीं थी, तो फिर इतनी बड़ी ‘मौत की इंडस्ट्री’ आखिर चल कैसे रही थी?
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