उत्तराखंड में सियासी घमासान तेज, अगले कई दिन सड़कें बनेंगी चुनावी अखाड़ा
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और भाजपा दोनों सड़कों पर उतरकर मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने ...और पढ़ें
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समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अश्वनी त्रिपाठी, जागरण, देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सड़कें अब सियासत का केंद्र बनने जा रही हैं। कांग्रेस न्याय यात्रा के जरिये भाजपा सरकार को घेरने सड़क पर उतरी है, तो भाजपा ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान से कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने की तैयारी में है।
दोनों दलों की इन गतिविधियों को केवल विरोध-प्रदर्शन या जनसंपर्क तक सीमित नहीं देखा जा सकता। इनके जरिये चुनाव से पहले मतदाताओं के बीच अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश होगी।
कांग्रेस ने गढ़वाल, कुमाऊं, हरिद्वार और देहरादून में न्याय यात्रा शुरू कर दी है, अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिये कांग्रेस सरकार को घेरना चाहती है। कांग्रेस की कोशिश सरकार के कामकाज को लेकर व्यापक चर्चा खड़ी करना है।
दूसरी ओर, भाजपा ने 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक दो चरणों में प्रदेशव्यापी अभियान चलाने की घोषणा की है। इसके तहत सभी जिलों में जनसंवाद व पदयात्रा के माध्यम से पार्टी केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाएगी।
भाजपा का प्रयास कांग्रेस के सवालों का जवाब देने के साथ राजनीतिक विमर्श का केंद्र सरकार की उपलब्धियों और विपक्ष की भूमिका की ओर मोड़ना है।
मुद्दों की धार तय करेगी राजनीतिक बढ़त
दोनों दलों की रणनीतियों में अंतर स्पष्ट है। कांग्रेस सरकार के खिलाफ असंतोष और जनसमस्याओं को राजनीतिक चुनौती में बदलना चाहती है, जबकि भाजपा विपक्ष के आरोपों का प्रतिवाद करते हुए अपने शासन का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखने की तैयारी में है।
ऐसे में मुकाबला केवल इस बात का नहीं होगा कि किसकी पदयात्रा में कितनी भीड़ जुटती है, बल्कि यह भी होगा कि कौन अपने मुद्दों को जनता की प्राथमिकताओं से जोड़ पाता है।
चुनावी तैयारी की पहली बड़ी परीक्षा
इन अभियानों से दोनों दलों को अपने संगठन की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व की पकड़ और कार्यकर्ताओं की भागीदारी परखने का अवसर मिलेगा। कांग्रेस के लिए चुनौती है कि वह मुद्दों को लगातार चर्चा में बनाए रखते हुए उन्हें जनसमर्थन में बदल सके।
भाजपा के सामने सरकार की उपलब्धियों के प्रचार के साथ स्थानीय समस्याओं पर जनता का भरोसा बनाए रखने की चुनौती होगी। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह सियासी लामबंदी दोनों दलों के लिए अपनी ताकत और कमजोरियों को परखने का अवसर भी है।
