उत्तराखंड कांग्रेस की कलह में कई कहानियां, कई किरदार... 13 साल पुरानी हैं जड़ें
उत्तराखंड कांग्रेस में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले 13 साल पुरानी अंदरूनी कलह फिर से सतह पर आ गई है। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
केदार दत्त, देहरादून। कहते हैं पुरानी अदावतें मुश्किल से जाती हैं। ये कब किस रूप में आ जाएं, कहा नहीं जा सकता। अदावतें यदि राजनीतिक हों तो इसमें अंतर्कलह, गुटबाजी और दुरुभिसंधियां सामने आती रही हैं। 10 साल से राज्य की सत्ता से दूर चल रही कांग्रेस में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अब ये अदावतें सामने आ रही हैं।
वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ‘हरदा’ के कारण कांग्रेस में उपजा मौजूदा घटनाक्रम इसका उदाहरण है। इसकी जड़ें 13 साल पुरानी हैं, जो आज भी गहरी हैं। आसमानी आपदा से लेकर सियासी आपदा तक की इस कलह में कई कहानियां और कई किरदार हैं।
2013 की केदारनाथ आपदा
यू तों उत्तराखंड बनने के बाद से ही कांग्रेस अंतर्कलह, धड़ेबाजी के दंश से जूझती रही है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम के आलोक में देखें तो इसकी शुरुआत वर्ष 2013 से मानी जा सकती है। जून, 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया था और उस समय कांग्रेस सरकार में विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री थे, जबकि हरदा की केंद्र में तूती बोलती थी।
हरदा के मोर्चा खोलने पर हालात ये बने कि बहुगुणा को पद छोड़ना पड़ा। अब प्रदेश की कमान हरदा के हाथ में आ गई। यद्यपि, हरदा के लिए भी सफर आसान नहीं रहा। 18 मार्च, 2016 में हुए राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस ने पार्टी में ऐतिहासिक विभाजन भी देखा।
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उस समय अंतर्कलह और धड़ेबाजी इतनी बढ़ी कि तब विधानसभा के बजट सत्र के दौरान कांग्रेस के नौ विधायकों विजय बहुगुणा, डा हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, अमृता रावत, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, प्रदीप बत्रा, शैलारानी रावत, उमेश शर्मा काऊ व शैलेंद्र मोहन सिंघल ने सदन में खड़े होकर सरकार पर अविश्वास जताया।
नतीजतन, हरदा की सरकार अल्पमत में आ गई। राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगा। इससे पहले हुए स्टिंग आपरेशन में हरदा ने जो कहा.., वह सभी ने देखा। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इतने बड़े घटनाक्रम के बावजूद हरदा बाद में अपनी सरकार बचा ले गए लेकिन कांग्रेस को टूटने से नहीं बचा पाए।
यद्यपि, इस घटनाक्रम और ऊहापोह, अंतर्कलह ने पार्टी को इतना कमजोर कर दिया कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में हरदा स्वयं चुनाव हार गए और कांग्रेस मात्र 11 सीटों पर सिमट गई। वर्ष 2022 में भी पार्टी की यही परिणति हुई। इस दौरान हरदा के मुख्यमंत्रित्व काल में कांग्रेस छोड़ने वाले डा. हरक सिंह, यशपाल आर्य समेत कई नेताओं की वापसी भी हुई। यहां से अंतर्कलह और बढ़ा।
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गुटबाजी फिर से सतह पर
अब कांग्रेस अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है तो गुटबाजी फिर से सतह पर है। इस बार एक खेमे में हरदा व उनके समर्थक हैं तो दूसरे खेमे प्रदेश कांग्रेस के अन्य नेता। हरदा ने पार्टी हाईकमान के निर्देशों की अनदेखी कर यात्रा निकाली तो इसमें प्रदेश चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह समेत सात विधायक आदेश चौहान, तिलकराज बेहड़, हरीश धामी, मदन बिष्ट, सुमित ह्दयेश, मनोज तिवारी भी शामिल हुए।
कहानी में नया मोड़ तब आया जब हरदा ने अपने समर्थक रामनगर के युवा नेता संजय नेगी का इंटरनेट मीडिया में समर्थन किया तो खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार का नाम लिए बगैर उन पर निशाना साधा। वर्ष 2016 में उमेश कुमार ने ही हरदा का स्टिंग किया था।
