विकास धूलिया, देहरादून: भाजपा हाईकमान ने त्रिवेंद्र सिंह रावत की मुख्यमंत्री पद से विदाई का जिस तरह अप्रत्याशित फैसला लिया, उनके उत्तराधिकारी के रूप में तीरथ सिंह रावत को चुनकर उससे भी ज्यादा चौंका दिया। मुख्यमंत्री पद के दावेदारों तक में तीरथ का नाम शुमार नहीं किया जा रहा था, मगर उनकी निर्गुट और निर्विवाद छवि ने आखिरकार उनके सिर ही ताज सजा दिया। इसके अलावा पौड़ी (गढ़वाल) संसदीय सीट, जिसका प्रतिनिधित्व तीरथ कर रहे हैं, की भाजपा के लिहाज से सुरक्षित स्थिति भी तीरथ के पक्ष में गई।

गुजरी छह मार्च से उत्तराखंड में राजनीतिक घटनाक्रम अचानक तेजी से बदला। भाजपा नेतृत्व ने केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में पार्टी उपाध्यक्ष रमन सिंह और प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम को उत्तराखंड भेज प्रदेश कोर ग्रुप की बैठक में पार्टी नेताओं से फीडबैक लेकर रिपोर्ट नेतृत्व को सौंपी, जिसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत को दिल्ली तलब कर विदाई की पटकथा से अवगत करा दिया गया। मंगलवार को देहरादून लौटकर त्रिवेंद्र ने राज्यपाल को इस्तीफा सौंपा और चार दिन चली हलचल व ऊहापोह की स्थिति पर विराम लगा दिया।

त्रिवेंद्र की विदाई के बाद नए मुख्यमंत्री के नाम की चर्चा जब शुरू हुई तो इनमें हरिद्वार सांसद व केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, नैनीताल सांसद अजय भट्ट, त्रिवेंद्र की टीम में शामिल सतपाल महाराज व धन सिंह रावत के नाम मुख्य रूप से शामिल थे। सांसद होने के बावजूद शुरुआत में तीरथ की दावेदारी को अनदेखा किया गया, लेकिन सियासी हालात कुछ ऐसे बने कि हाईकमान ने उन्हीं पर भरोसा जताया। दरअसल, भाजपा ने हरिद्वार व नैनीताल लोकसभा सीटों पर उपचुनाव का जोखिम मोल लेना उचित नहीं समझा, जबकि पौड़ी (गढ़वाल) सीट पूरी तरह भाजपा के अनुकूल रही है। इससे निशंक या भट्ट की बजाय तीरथ को पार्टी ने मौका दिया। 

तीरथ के नाम से गढ़वाल व कुमाऊं के मध्य क्षेत्रीय व जातीय संतुलन भी खुद ब खुद सध गया। यह इसलिए, क्योंकि गढ़वाल से आने वाले तीरथ राजपूत हैं, जबकि भाजपा प्रदेश संगठन के मुखिया बंशीधर भगत कुमाऊं से और ब्राह्मण हैं। हालांकि ऐसा नहीं कि भाजपा में केंद्रीय स्तर पर तीरथ जाना पहचाना चेहरा न हों। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में कई पदों के अलावा संघ के प्रचारक तक का दायित्व उन्होंने निभाया। अविभाजित उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्य रहे और उत्तराखंड के अलग राज्य बनने पर नित्यानंद स्वामी के नेतृत्व में पहली अंतरिम सरकार में शिक्षा मंत्रालय उन्होंने बखूबी चलाया।

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प्रदेश अध्यक्ष पद तीरथ ने दो साल संभाला। वर्ष 2017 में उन्हें विधानसभा चुनाव नहीं लड़ाया गया तो संगठन में राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी दे दी गई। फिर भुवन चंद्र खंडूड़ी की पारंपरिक सीट रही पौड़ी (गढ़वाल) से उन्हें लोकसभा में भेजा गया। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि और संगठन के व्यापक अनुभव के कारण पार्टी ने उन्हें सतपाल महाराज और धन सिंह रावत पर तरजीह दी। इसके अलावा तीरथ किसी गुट विशेष के नहीं माने जाते और 24 साल के राजनीतिक जीवन में किसी विवाद से भी उनका कोई नाता नहीं रहा।

छह साल के मुख्यमंत्री

अगर तीरथ पार्टी की अपेक्षाओं पर खरे उतरे तो तय है कि वह उत्तराखंड के कम से कम छह साल के मुख्यमंत्री साबित हो सकते हैं। मौजूदा सरकार का कार्यकाल अभी एक साल बाकी है। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि तीरथ विधानसभा चुनाव की अग्निपरीक्षा में सफल हो जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से वर्ष 2022 में पार्टी फिर नेतृत्व के लिए उन्हीं की ओर निगाह करेगी।

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