जागरण संवाददाता, देहरादून: स्वामी मैथिलीशरण ने कहा कि तपस्या एक अभ्यास है और भगवान के चरणों में प्रेम उसी तपस्या का चरम फल है। संसार के समस्त धर्मों को एक साथ धारण करने का दुरुह कार्य केवल भरत ही कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि संसार में भरत का जन्म न हुआ होता तो हरि चरणों में पूर्ण प्रेम का अमृत कलश प्रकट ही नहीं हो पाता।

स्वामी मैथिलीशरण सुभाष रोड स्थित चिन्मय मिशन आश्रम में चल रही सात दिवसीय भरत चरित्र कथा के अंतिम दिन प्रवचन कर रहे थे। कहा कि पर्वत-कंदराओं में जाकर साधना करना किसी विशेष अभ्यास से ही संभव है, लेकिन भरत ने जो साधना महल और नंदीग्राम में रहकर की, वह उत्कृष्ट है। ऐसी साधना जब तक व्यक्ति पूरी तरह अहम भाव से ऊपर न उठ जाए और हरि चरणों में अनुरक्त न हो जाए, तब तक संभव नहीं है। कहा कि अपनी तपस्या की शक्ति से विश्वामित्र त्रिशंकु के लिए नए स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं। लेकिन, वे वशिष्ठ की तपस्या के प्रभाव से की गई अलौकिक सेवा को देखकर अपने आप को कामधेनु की पुत्री नंदिनी गाय के लोभ से ऊपर नहीं उठा सके। महर्षि वशिष्ठ के गाय न देने पर वे उनसे बैर ठान लेते हैं। कहा कि वैदिक और पौराणिक काल में भरत के समान न कोई महापुरुष नहीं हुआ, जो अपनी समस्त उपलब्धियों को श्रीचरणों की सेवा सामग्री बना सके। साथ ही राम के अतिरिक्त जिसका कोई लक्ष्य ही न हो।

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गीता भवन में आज से हनुमान चरित्र कथा

श्री राम किंकर विचार मिशन के परमाध्यक्ष स्वामी मैथिलीशरण आज से तीन दिन शाम छह से रात आठ बजे तक राजा रोड स्थित गीता भवन में हनुमान चरित्र कथा का वाचन करेंगे। गीता भवन की ओर से इस श्रीरामचरितमानस ज्ञानयज्ञ में भक्तजनों को कथा श्रवण के लिए आमंत्रित किया गया है।

भरत चरित्र कथा का श्रवण आप यू-ट्यूब पर भी कर सकते हैं। इसके लिए यू-ट्यूब पर जाकर bhaijimaithili's broadcast सर्च कर सकते हैं अथवा लिंक https://youtu.be/QgueWR2Jp-s को सब्सक्राइब कीजिए।

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Edited By: Sumit Kumar