देहरादून, सुमन सेमवाल। आज पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों से निपटने के जतन कर रहा है और ग्लेशियरों की सेहत की चिंता निरंतर सता रही है। ऐसे में उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित केदारनाथ मंदिर व इसके निकटवर्ती चौराबाड़ी ग्लेशियर में रिकॉर्ड बर्फबारी होने से वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हैं। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों की ओर से जुटाए गए बर्फबारी के ताजा आंकड़ों की बात करें तो 3583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ मंदिर में 40 फीट बर्फबारी हो गई तो चौराबाड़ी ग्लेशियर क्षेत्र में 4270 मीटर ऊंचाई पर बने एडवांस बेस कैंप पर यह आंकड़ा 50 फीट तक जा पहुंचा।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ हिमनद विशेषज्ञ डॉ. डीपी डोभाल के मुताबिक, बर्फबारी के आंकड़े एकत्रित करने के लिए हाल में ही रुद्रप्रयाग के चौराबाड़ी ग्लेशियर का रुख किया गया था। यहां पर आंकड़े एकत्रित करने के लिए एडवांस बेस कैंप (एबीसी) पर करीब 17 लाख रुपये के दो ऑटो वेदर स्टेशन लगाए गए थे। साथ ही इसके नीचे 3910 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बेस कैंप में रहने के लिए प्री-फैब्रिकेटेड हट बनाई गई थी।

इस दफा जनवरी से लेकर अप्रैल तक इतनी अधिक बर्फ पड़ी कि बर्फ के दबाव से जहां हट पूरी तरह पिचक गई, वहीं ऑटो वेदर स्टेशन भी क्षतिग्रस्त हो गए। ऐसे में इनसे त्वरित डाटा निकालने का काम नहीं हो पाया। इसकी जगह केदारनाथ मंदिर क्षेत्र में निर्माण कार्य कर रही वुडस्टॉन कंस्ट्रक्शन कंपनी से बर्फबारी के आंकड़े लिए गए। साथ ही ग्लेशियर क्षेत्र में अब तक मौजूद बर्फ के आधार पर बर्फबारी का विश्लेषण किया गया। पता चला कि केदारनाथ मंदिर में सीजन में (जनवरी से अप्रैल) 40 फीट बर्फ पड़ी और चौराबाड़ी ग्लेशियर में यह आंकड़ा करीब 50 फीट पाया गया। 

डॉ. डोभाल ने बताया कि चौराबाड़ी ग्लेशियर की मॉनिटरिंग वर्ष 2003 से की जा रही है। तब से लेकर पिछले साल तक यहां औसतन 15 फीट बर्फ पड़ रही है। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में भी बर्फबारी का आंकड़ा इसके आसपास रहा। तब जून माह में बेस कैंप में दो फीट बर्फ जमा थी और इस दफा छह फीट बर्फ शेष है।

एक हजार फीट नीचे आई स्नो लाइन 

केदारनाथ क्षेत्र में स्नो लाइन पांच हजार मीटर पर रहती है। इस दफा रिकॉर्ड स्तर पर बर्फबारी होने के चलते यह चार हजार मीटर पर आ गई है। यानी स्नो लाइन का दायरा एक हजार मीटर नीचे आ गया। हालांकि, अभी यह बर्फ कच्ची है और सितंबर-अक्टूबर में ही स्पष्ट हो पाएगा कि बर्फबारी से स्नोलाइन कितनी नीचे आई है।

इस सीजन नहीं पिघलेगा ग्लेशियर 

वाडिया संस्थान के हिमनद विशेषज्ञ डॉ. डोभाल का मानना है कि इस साल ग्लेशियर की बर्फ पिघलने की उम्मीद कम ही है और जो ग्लेशियर के ऊपर अतिरिक्त बर्फ जमी है, वही पिघलेगी। यदि अगले सीजन में भी इसी तरह बर्फबारी हुई तो ग्लेशियर की सेहत और बेहतर हो जाएगी। 

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Posted By: Sunil Negi

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