देहरादून, [जेएनएन]: जैव विविधता के लिए मशहूर उत्तराखंड में मानव और वन्यजीव संघर्ष चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है। एक-दूसरे क्षेत्र में अतिक्रमण के चलते उत्‍पन्‍न इस संघर्ष में मानव और वन्‍यजीव, दोनों को जान देकर कीमत चुकानी पड रही है। राज्‍य बनने के बाद पिछले 18 वर्षों से इस संघर्ष को लेकर चिंता तो हर स्‍तर पर हो रही, मगर इससे निबटने का कोई ठोस तरीका अब तक जमीन में आकार नहीं ले पाया है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब रिवेंज किलिंग(प्रतिशोध की भावना से हत्या) के चलते बेजुबानों को जान से हाथ धोना पड रहा है।

हाल में ही राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे हरिद्वार वन प्रभाग की श्‍यामपुर रेंज में बाघिन को बदले की भावना के चलते मौत के घाट उतार दिया गया था। मामले की जांच रिपोर्ट में इसकी पुष्टि भी हुई। अब हरिद्वार वन प्रभाग की ही खानपुर रेंज में नर हाथी की हत्‍या भी रिवेंज किलिंग की ओर इशारा कर रही है। ऐसे में अब वन्‍यजीवों के लिए एक नई मुसीबत सामने आई है। इससे वन महकमे के साथ ही हर जागरूक व्‍यक्ति के माथे पर चिंता की लकीरें ला दी हैं। 

यह है वजह 

उत्तराखंड में बढते मानव-वन्यजीव संघर्ष के पीछे एक नहीं अनेक कारण हैं। विकास और जंगल के मध्‍य सामंजस्‍य के अभाव के दुष्‍परिणाम अब सामने आने लगे हैं, बल्कि यूं कहिये कि स्थिति भयावह रूप धरने लगी है। विकास की अंधी दौड़ में हम यह भी भूल बैठे हैं कि यदि किसी के घर में अतिक्रमण करेंगे तो इसकी प्रतिक्रिया भी सामने आएगी ही। राज्‍य के जंगलों में पल बढ रहे वन्‍यजीवों के मामले में भी तस्‍वीर ऐसी ही है। कहीं सडक व रेल मार्गों ने उनके स्‍वच्‍छंद विचरण में बाधा डाली है तो कहीं उनकी आवाजाही के रास्‍तों में मानव बस्तियां उग आई हैं।

ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण सामने हैं। परिणामस्‍वरूप वन्‍यजीव दड़बों में सिमटकर रह गए हैं। जंगल की देहरी पार करते ही वन्‍यजीवों का मनुष्‍य से सामना हो रहा है। यही नहीं, वन्‍यजीव किसानों की मेहनत पर भी डाका डाल रहे हैं। कहीं हाथी, सूअर, बंदर जैसे वन्‍यजीव फसलों को चौपट कर रहे हैं, वहीं बाघ, गुलदार, भालू जैसे जानवरों के आबादी के नजदीक सक्रिय होने से जान का खतरा अलग से बना हुआ है।

नतीजा, बढते संघर्ष के रूप में सामने आया है। मानव-वन्‍यजीव संघर्ष की चिंताजनक स्थिति को इसी से समझा जा सकता है कि राज्‍य गठन के बाद से अब तक करीब 625 लोगों को वन्यजीवों के हमलों में जान गंवानी पडी है, जबकि इसके तीन गुने से अधिक लोग घायल हुए हैं। यही नहीं,  बडे पैमाने पर वन्‍यजीवों को भी जान गंवानी पडी है। 

संघर्ष रोकने की ठोस नीति नहीं, रिवेंज किलिंग के मामले भी सामने   

71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड के संरक्षित और आरक्षित वन क्षेत्रों में मौजूद वन्यजीव निश्चित रूप से देश-दुनिया में राज्य को अलग पहचान दिलाते हैं, मगर ये भी सच है कि इनकी सुरक्षा को लेकर अभी बहुत कुछ होना बाकी है। मनुष्य और वन्यजीव दोनों महफूज रहें, इस लिहाज से कदम उठाने की दरकार है और इसी मोर्चे पर हीलाहवाली का आलम है। 

नतीजतन, शिकारियों-तस्करों के बाद रिवेंज किलिंग की दोहरी मार वन्यजीवों पर पड़ रही है। खासकर बाघ और गुलदारों के मामले में। मनुष्यों और मवेशियों पर हमले की घटनाओं के मद्देनजर बदला लेने की नीयत से भी इनकी हत्या होने लगी है। कहीं जहर देकर तो कहीं करंट और कहीं इन जानवरों को घेरकर मार डालने की बातें कई मौकों पर सामने आई हैं, मगर सुबूतों के अभाव में बात आई-गई होती रही। 

बाघिन की मौत के मामले में रिवेंज किलिंग की पुष्टि 

हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज में हुई बाघिन की मौत के मामले में रिवेंज किलिंग की पुष्टि हुई है। दरअसल, बीती 10 मई को श्यामपुर रेंज के कक्ष पांच में दो साल की बाघिन का शव मिला था। इसे लेकर खूब बवाल मचा तो 18 मई को विभाग ने प्रकरण की जांच तेजतर्रार माने जाने वाले आइएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को सौंप दी।

उन्होंने गहन जांच पड़ताल के बाद अपनी अंतरिम जांच रिपोर्ट मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को भेज दी है। जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रकरण में सामने आए तथ्यों, बयानों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के विश्लेषण से साफ है कि बाघिन की मौत प्राकृतिक, बीमारी, आपसी संघर्ष व किसी अन्य वन्यजीव के आक्रमण से न होकर, सुनियोजित प्रकार से मानवजन्य है। जांच पड़ताल में बाघिन की इरादतन हत्या की पुष्टि होती है। यह भी उल्लेख है कि इस क्षेत्र में जून 2017 से जनवरी 2018 तक 17 पालतू पशु बाघों ने मारे। 

10 मई को जिस जगह बाघिन का शव मिला, उससे डेढ़ सौ मीटर के फासले पर एक भैंस मृत मिली थी। रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला प्रतिशोधात्मक हत्या का प्रतीत होता है, जो वन्यजीव अपराध संरक्षण अधिनियम में अपराध है। सिफारिश की गई है कि मामले में अगली कार्यवाही के लिए सक्षम अधिकारी की नियुक्ति की जाए। 

'रिवेंज किलिंग' का शिकार बना 'टस्कर' 

वहीं, राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे हरिद्वार वन प्रभाग में पहले बाघिन और अब राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी की हत्या। श्यामपुर रेंज में बाघिन के बाद अब खानपुर रेंज में गोली लगने से नर हाथी (टस्कर) की मौत रिवेंज किलिंग (प्रतिशोध के लिए हत्या) की ओर इशारा कर रही है। जिस क्षेत्र में हाथी मृत मिला, वहां लंबे समय से हाथियों की धमाचौकड़ी से लोग परेशान हैं। आशंका जताई जा रही कि इसी के चलते हाथी को गोली मार दी गई या फिर किसी पर हमले के दौरान। हाथी के दांत सुरक्षित मिलने के कारण इस आशंका को बल मिल रहा है। 

हरिद्वार प्रभाग की श्यामपुर रेंज में इस साल मई में हुई बाघिन की मौत के मामले की जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ था कि बाघिन रिवेंज किलिंग का शिकार बनी। यह मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अब हरिद्वार प्रभाग की खानपुर रेंज में नर हाथी की हत्या ने वन विभाग की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। यह हाथी गुरुवार को बुग्गावाला क्षेत्र के डालूवाला गांव के पास मृत मिला था और उसके शरीर में छर्रे धंसे हुए थे। अलबत्ता, उसके दांत समेत अन्य अंग सुरक्षित मिले। 

टस्कर को किसने मारा, इस सवाल को हल करने के मद्देनजर वन महकमे की टीम जांच पड़ताल में जुटी हुई है। सूत्रों के मुताबिक हरिद्वार प्रभाग से हाथी राजाजी टाइगर रिजर्व में आते-जाते रहते हैं। खानपुर रेंज में जिस जगह से हाथी आवाजाही करते हैं, वहां वन सीमा पर सुरक्षा दीवार टूटी हुई है। माना जा रहा कि यहां से निकलकर हाथी आसपास के गांवों के खेतों में घुस रहे हैं। 

सूत्रों ने बताया कि हाथी को बाएं पैर से लेकर फेफड़े तक छर्रे लगे हैं। इस प्रकार की बंदूक का इस्तेमाल लोग खेतों से सूअरों को भगाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। आशंका है कि फसलों को लगातार क्षति पहुंचाए जाने के चलते किसी ने हाथी को गोली मार दी हो। ये भी संभावना जताई जा रही कि हाथी ने किसी पर हमले का प्रयास किया होगा तो उसे गोली मार दी गई। साफ है कि परिस्थितियां प्रतिशोध के लिए हाथी की हत्या की तरफ इशारा कर रही हैं। 

मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक मनीष मलिक ने बकाया कि हरिद्वार वन प्रभाग में हाथी की हत्या चिंता का विषय है। परिस्थितियां रिवेंज किलिंग की ओर इशारा कर रही हैं। हालांकि, प्रकरण की अभी जांच चल रही है और जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।

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Posted By: Raksha Panthari