देहरादून, रितिका पठानिया। हिंसा और उत्पीड़न का दंश झेल रही महिलाओं को वन स्टॉप सेंटर (सखी) संबल दे रहा है। महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार की ओर से गठित किया गया वन स्टॉप सेंटर उत्तराखंड में भी महिलाओं को इंसाफ दिलाने का कार्य कर रहा है। दून में 11 दिसंबर 2017 को इस सेंटर का उद्घाटन हुआ था, जिसके बाद से अब तक यहां कुल 357 मामले आए, जिनमें से 272 मामलों में महिलाओं को न्याय मिला है। जबकि 85 मामले अभी लंबित हैं। 

महिला हेल्पलाइन नंबर 181 पर आई पीड़ित महिलाओं की शिकायतों को वन स्टॉप सेंटर में भेज दिया जाता है। जहां महिलाओं को पांच दिन तक रहने, खाने, कपड़े, स्वास्थ्य सुविधाएं और कानूनी सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है। पांच दिनों के बाद महिला का केस देखते हुए उन्हें नारी निकेतन, महिला छात्रावास या घर भेज दिया जाता है। जबकि कोर्ट में चल रहा केस बरकरार रहता है। जिसके लिए महिलाओं को सरकारी वकील मुहैया करवाया जाता है। 

घरेलू हिंसा के मामले सबसे अधिक 

महिला सशक्तिकरण और बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी अखिलेश मिश्रा ने बताया कि डेढ़ माह में आए मामलों में सबसे अधिक मामले घरेलू हिंसा के रहे। इसके कुल 291 मामले रहे, जिनमें से 210 मामलों को सुलझा लिया गया है, जबकि 81 केस लंबित पड़े हैं। वहीं, बाल यौन शोषण के 17 मामले रहे, जिनमें 16 मामलों को तो सुलझा लिया गया है और एक मामला लंबित है। यौन उत्पीड़न के सभी चार मामलों को सुलझा लिया गया है। अपहरण के तीन मामलों में से दो को सुलझा लिया गया। इसके अलावा साइबर क्राइम के दोनों मामलों को भी सुलझा लिया गया है। 

33 महिलाओं को मिला शेल्टर 

महिला सशक्तीकरण और बाल विकास विभाग की केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारी माया नेगी ने बताया कि वन स्टॉप सेंटर में 33 महिलाओं को शेल्टर उपलब्ध करवाए गए हैं। जबकि 24 महिलाओं को चिकित्सा सुविधा और 80 महिलाओं को विधिक सहायता उपलब्ध करवाई गई है। जिसमें 40 महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार थीं। माया ने बताया कि सभी महिलाओं की समय-समय पर काउंसलिंग की जाती है। 

आखिरकार पति को देना पड़ा खर्च 

वन स्टॉप सेंटर में आई एक पीड़ित महिला ने बताया कि उसका पति उसके साथ हिंसा करता था, जिससे वह अलग होकर किराये के कमरे में रहने चली गई। उसकी एक 12 साल की बेटी और नौ साल का बेटा है। जिनके लिए उसका पति किसी तरह का कोई खर्च मुहैया नहीं कराता। लेकिन वन स्टॉप सेंटर की मदद से केवल उन्हें छह माह में ही बच्चों के लिए खर्च मिलने लगा। 

यह है वन स्टॉप सेंटर 

इसके अंतर्गत सभी हिंसा से पीड़ित महिलाओं और बालिकाओं को एक ही स्थान पर अस्थायी आश्रय, पुलिस डेस्क, विधि सहायता, चिकित्सा और काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। 

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यह है सेंटर का उद्देश्य 

इस योजना का उद्देश्य एक ही छत के नीचे पीड़ित महिलाओं और बालिकाओं को एकीकृत रूप से सहायता और सहयोग प्रदान करना है। जिसके लिए यहां पीड़ित महिलाओं को तत्काल आपातकालीन और गैर आपातकालीन सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ ही चिकित्सा, विधिक और मनोवैज्ञानिक परामर्श दिया जाता है। 18 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं की सहायता के लिए लैंगिक अपराधों से बाल्य का संरक्षण अधिनियम-2012 और किशोर न्याय अधिनियम-2015 के अंतर्गत गठित संस्थाओं को जोड़ना भी वन स्टॉप सेंटर का उद्देश्य है। 

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