एमबीबीएस फर्जी दाखिला: फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनाएं? प्रशासनिक मिलीभगत पर अब भी पर्दा
एमबीबीएस फर्जी दाखिला प्रकरण की जांच धीमी पड़ गई है, जिसमें देहरादून और कुमाऊं से 12 आरोपित गिरफ्तार हुए हैं, लेकिन पांच नामजद आरोपित अब भी फरार हैं।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
- एमबीबीएस फर्जी दाखिला प्रकरण: नामजद आरोपितों को भी गिरफ्तार नहीं कर पाई एसआइटी
- फर्जीवाड़ा मामले में देहरादून व कुमाऊं में अब तक 12 आरोपितों की हो पाई है गिरफ्तारी
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जागरण संवाददाता, देहरादून: उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) के चर्चित नकल प्रकरण की तरह एमबीबीएस में फर्जी दाखिले का मामला भी धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में जाता दिखाई दे रहा है।
मामले में देहरादून और कुमाऊं क्षेत्र से अब तक 12 आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद जांच कई अहम सवालों के जवाब तलाशने में आगे नहीं बढ़ पाई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि फर्जी दस्तावेज तैयार कराने और उनके आधार पर दाखिले की कोशिश के पीछे सक्रिय नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों तक एसआइटी कब पहुंचेगी।
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मामले में नामजद पांच आरोपितों की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो पाई है। वहीं, फर्जी प्रमाणपत्र तैयार करने में प्रशासनिक स्तर पर किसकी भूमिका रही, यह भी जांच में स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है। ऐसे में कार्रवाई की रफ्तार और जांच की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
एमबीबीएस दाखिला फर्जीवाड़े की जांच में सामने आया था कि स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कर दाखिला प्रक्रिया में लाभ लेने की कोशिश की गई। जांच के दौरान अन्य श्रेणियों के प्रमाणपत्रों, विशेषकर ओबीसी प्रमाणपत्रों की सत्यता को लेकर भी सवाल उठे।
इससे आशंका जताई गई कि मामला केवल एक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं, बल्कि विभिन्न श्रेणियों के दस्तावेज तैयार कराने और उनके जरिए लाभ लेने की व्यापक कोशिश से जुड़ा हो सकता है।
नामजद आरोपितों की गिरफ्तारी न होना बड़ा सवाल
देहरादून और कुमाऊं में 12 आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद भी पांच नामजद आरोपितों का पकड़ से बाहर रहना जांच की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
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इन आरोपितों की भूमिका और उनके नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने से पूरे मामले की तस्वीर अब तक अधूरी है। इस प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू प्रशासनिक स्तर पर कथित मिलीभगत का है। आखिर ऐसे प्रमाणपत्र तैयार कराने की प्रक्रिया में किस स्तर पर चूक हुई।
पटवारी व लेखपाल की भूमिका पर भी सवाल
देहरादून में राजस्व उपनिरीक्षक से लेकर लेखपाल स्तर तक की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब तक संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी हुई तो यह पता लगाना जरूरी है कि वह लापरवाही का परिणाम थी या इसके पीछे किसी तरह की मिलीभगत थी।
किसी भी बड़े फर्जीवाड़े की जांच में केवल दस्तावेजों का इस्तेमाल करने वालों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होती। यह भी पता लगाना जरूरी है कि प्रमाणपत्र तैयार कराने वाला कौन था, सत्यापन किसने किया और दाखिले की प्रक्रिया में इन दस्तावेजों का लाभ दिलाने के लिए किस स्तर पर मदद की गई।
