लद्दाख के ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन का कहर, तेजी से सिमट रहे छोटे ग्लेशियर
लद्दाख के डोडा बेसिन में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे हिमालयी पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुमन सेमवाल, देहरादून। पश्चिमी हिमालय (लद्दाख) में ग्लेशियरों का तेजी से पीछे हटना और बर्फ के भंडार में कमी आना हिमालयी पर्यावरण के लिए गंभीर संकेत है।
डोडा नदी बेसिन में किए गए वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के नये अध्ययन में सामने आया है कि तीन दशक में ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय कमी आई है। छोटे ग्लेशियरों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक पड़ा है।
यह अध्ययन स्प्रिंगर की शोध पत्रिका रीजनल एनवायरनमेंटल चेंज में सात अक्टूबर को प्रकाशित किया गया है। वरिष्ठ विज्ञानी डा मनीष मेहता के अध्ययन के अनुसार, ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, अग्रभाग के पीछे हटने, सतही गति, ऊंचाई में बदलाव और बर्फ के संतुलन का आकलन किया गया है।
तीन दशक में घटा ग्लेशियरों का क्षेत्रफल
अध्ययन में शामिल 25 ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल वर्ष 2005 में लगभग 346 वर्ग किलोमीटर था, जो वर्ष 2023 में घटकर करीब 343 वर्ग किलोमीटर रह गया। इस तरह 18 वर्षों में लगभग तीन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र कम हुआ। प्रतिशत में यह गिरावट करीब 0.9 प्रतिशत है।
10 वर्ग किलोमीटर से बड़े ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में लगभग 1.2 प्रतिशत की कमी आई। पांच से 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले मध्यम आकार के ग्लेशियरों में यह कमी करीब 3.8 प्रतिशत रही। वहीं, पांच वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियरों का क्षेत्रफल लगभग 12.9 प्रतिशत घट गया।
बड़े ग्लेशियरों की सतही गति भी घटी
विज्ञानियों ने ग्लेशियरों की सतह पर बर्फ की गति का भी आकलन किया। अध्ययन में वर्ष 1999-2000 और 2022-2023 की अवधि की तुलना की गई। बड़े ग्लेशियरों की औसत सतही गति में लगभग 44.5 प्रतिशत, जबकि मध्यम आकार के ग्लेशियरों में करीब 33 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
यह निष्कर्ष बताता है कि ग्लेशियरों की गति में बदलाव केवल उनके क्षेत्रफल तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी आंतरिक गतिशीलता में भी परिवर्तन हो रहा है। ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, मोटाई और गति में बदलाव का असर भविष्य में जल उपलब्धता पर पड़ भी सकता है।
