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उत्तराखंड पर मंडराया खतरा, ग्लेशियरों के पिघलने से उच्च हिमालयी क्षेत्र में बनीं 77 नई झीलें

Published: Fri, 28 Aug 2026 11:18 AM (IST)

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से पिथौरागढ़ में 77 नई झीलें बनी हैं, जिससे बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

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किशोर जोशी, नैनीताल। नेपाल-तिब्बत सीमा पर भूस्खलन व बाढ़ की विनाशलीला के पीछे के कारणों पर विशेषज्ञ आगे भी अध्ययन करेंगे। इस आपदा के क्रम में उच्च हिमालयी इलाकों में तापमान बढ़ने से 32 साल में 20 प्रतिशत तक ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने की तीव्र गति विशेषज्ञों को भी चिंता में डाल रही है।

नेपाल से लगे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में ग्लेशियरों के पिघलने से उच्च हिमालयी क्षेत्र में 77 से अधिक नई झीलें बन गई हैं, जो मलबे से भरी हैं और किसी भी भू-गतिविधि या भारी वर्षा में फट सकती हैं। यह हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ ला सकता है। इससे नीचे बसे गांवों, खेती और पनबिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान हो सकता है।

1990 से 2022 तक गोरी गंगा क्षेत्र का अध्ययन

कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर नैनीताल में भूगोल विभाग के प्रो. देवेंद्र परिहार ने जीआइएस की मदद से वर्ष 1990 से 2022 तक गोरी गंगा क्षेत्र का अध्ययन किया। जिसमें सबसे चिंताजनक निष्कर्ष यह निकला कि 1990 में गोरी गंगा बेसिन का 30.9 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका था। 2022 में घटकर यह केवल 10.99 प्रतिशत रह गया। यानी 32 साल में लगभग 20 प्रतिशत बर्फ खत्म हो गई। यदि यही दर रही तो 2040 से पहले यह बेसिन पूरी तरह बर्फ विहीन हो सकता है।

शोध अध्ययन के अनुसार पिथौरागढ़ जिले में भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र में गोरी गंगा, काली नदी के आसपास के इलाकों पर ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियरों पर असर पड़ रहा है। इंसानी दखल से उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति नेपाल के तिब्बत से लगे ग्लेशियरों से अधिक तीव्र है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम व मानवीय गतिविधियों पर अंकुश जरूरी

प्रो. परिहार के अनुसार ग्लेशियरों में बर्फ का घटना न केवल जल संकट पैदा करेगा बल्कि बाढ़ और भूस्खलन जैसे आपदाओं को भी बढ़ाएगा। इसलिए बर्फ संरक्षण, झीलों की निगरानी और आपदा प्रबंधन पर काम करने की जरूरत है।

प्रो. परिहार के अनुसार हिमालय सबसे युवा और नाजुक पर्वत श्रृंखला है और जिसे धरती का सबसे ऊंचा वाटर टावर माना जाता है। जहां हिम आवरण वैश्विक गर्मी के कारण लगातार घट रहा है। इससे हिमनदीय झील बन रही हैं,जो बड़े खतरे का संकेत हैं। ऐसे में भविष्य में बड़ी आपदा से नुकसान से बचाव को अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के साथ ही नदी किनारे की भूमि पर मानवीय गतिविधियों पर अंकुश जरूरी है।

गोरी गंगा क्षेत्र में बेतरतीब अनियोजित विकास से भूस्खलन व बाढ़ की घटनाओं को रोकने के लिए बेहतर नियोजन की अत्यधिक जरूरत है। यहां त्वरित बाढ़ प्रभावित 15 गांव, बेतरतीब सड़क निर्माण व अनियोजित विकास से सक्रिय भूस्खलन वाले 91 से अधिक गांव तथा आपदाओं के बार-बार घटित होने से 25 से अधिक गांव आबाद जोखिम गांव की श्रेणी में आ गए हैं। - प्रो. देवेंद्र परिहार, कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल

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बड़ी आपदाओं में 20 हजार से अधिक मौत

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 1600 से 2200 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हर साल बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। इनमें 14 सितंबर 2012 को रुद्रप्रयाग, 18 अगस्त 2010 को मुनस्यारी, 19 अगस्त 2010 को कपकोट, सात अगस्त 2009 को नाचनी, 17 अगस्त 1998 को मालपा और ऊखीमठ, 24 जुलाई 2004 को बदरीनाथ, 1970 में अलकनंदा नदी घाटी की घटनाएं शामिल हैं। इन आपदाओं में लगभग 20,000 लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर संपत्ति का नुकसान हुआ। 17 जून 2013 की आपदा ने केदारनाथ, गंगोत्री और बदरीनाथ क्षेत्रों में, मंदाकिनी, भागीरथी और अलकनंदा नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में तबाही मचाई।

तापमान बढ़ने की गति से उत्तराखंड में भी खतरा कम नहीं : तिवारी

कुमाऊं विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष व जलवायु परिवर्तन पर दशकों से काम कर रहे प्रो. पीसी तिवारी के अनुसार नेपाल की भोटेकोशी नदी में पहले भी आपदाएं आई हैं। यह हिमालयी क्षेत्र की सबसे संकरी घाटी से निकलने वाली नदी है। नेपाल से तापमान बढ़ने की दर पश्चिम हिमालय क्षेत्र में अधिक तीव्र है। यदि हिमालय क्षेत्र का तापमान बढ़ेगा तो उत्तराखंड के भी

ग्लेशियरों की बर्फ पिघलेगी और काली चट्टानें रह जाएंगी, जो सूर्य की गर्मी को अधिक सोखती हैं। बर्फ पिघलने से हिमस्खलन होगा और झीलें बनेंगी, जिससे अतिवृष्टि की घटनाएं बढ़ेंगी और यहां की नेपाल से अधिक घनी आबादी व नदी किनारे के होटल, रिसोर्ट आदि आपदा की चपेट में आएंगे। नदी 20 से 100 साल में अपना बाढ़ वाला क्षेत्र छीन सकती है।

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