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जागरण फिल्म फेस्टिवल: अपनी बोली-भाषा को बचाइए, यही हमारी पहचान - सचिन

Published: Sun, 27 Sep 2026 04:07 PM (IST)

अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने जागरण फिल्म फेस्टिवल में बच्चों को अपनी मातृभाषा से जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ...और पढ़ें

अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और लेखक सचिन पिलगांवकर.

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जागरण संवाददाता, देहरादून। भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कार और पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने वाली कड़ी है। उत्तराखंड की गढ़वाली और कुमाऊंनी जैसी लोकभाषाओं को बचाने के लिए बच्चों को बचपन से अपनी मातृभाषा से जोड़ना जरूरी है।

अपनी भाषा से दूर होने पर व्यक्ति अपनी जड़ों से भी दूर हो सकता है। यह बात अभिनेता, निर्देशक, निर्माता और लेखक सचिन पिलगांवकर ने शनिवार को सिल्वर सिटी सिनेमाज में जागरण फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन आयोजित संवाद सत्र में कही।

''''नदिया के पार'''' के चंदन समेत ''''गीत गाता चल'''' और ''''आंखों के झरोखे से'''' जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके सचिन ने कहा कि कला की कोई भाषा नहीं होती। उन्होंने मराठी के साथ हिंदी और कन्नड़ में भी काम किया है। बताया कि वह और उनकी पत्नी घर में मराठी बोलते हैं, इसलिए उनकी बेटी भी मराठी बोलती है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में भी परिवारों को बच्चों से गढ़वाली और कुमाऊंनी में संवाद करना चाहिए, ताकि बोली के साथ लोक संस्कृति और परंपराएं भी आगे बढ़ें।

इस दौरान दर्शकों के सवालों का जवाब देकर जिज्ञासा शांत की। वही,दर्शकों के गीत की फरमाइश पर उन्होंने बड़े अच्छे लगते हैं, ये धरती ये नदियां और तुम सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध किया। गीत सुनाने के दौरान जैसे वे मंच पर खड़े हुए दर्शकों की तालियों से थियेटर गूंज उठा। सत्र का संचालन सृष्टि ने किया, जबकि नवनीत गैरोला ने संवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

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यादें कभी भी पुरानी नहीं होतीं
''''नदिया के पार'''' और ''''गीत गाता चल'''' जैसी फिल्मों के आज भी याद किए जाने पर सचिन ने कहा कि याद रखने वाली चीज कभी पुरानी नहीं होती। संस्कृति और भावनाओं से जुड़ी फिल्में पीढ़ियां बदलने के बाद भी लोगों के दिलों में रहती हैं। ''''कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया...'''' जैसे गीतों को उन्होंने संस्कृति और संस्कार से जुड़ा बताया।

अपने 63वें वर्ष के सिनेमा सफर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि पांच वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ी स्मृति भी साझा की। उन्होंने कहा कि आज करियर का 63वां साल है। लेकिन 1963 में रिलीज मराठी फिल्म को नेशनल अवार्ड मिला। तम मेरी उम्र पांच साल थी।

दूसरे राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अवार्ड दिया इस दौरान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी भी थी। सभी को लगा कि 10 या 12 साल का बच्चा आएगा अवार्ड लेने, लेकिन जैसे मै गया तो सभी चकित थे। जब मैं अवार्ड लेकर वापस जाने लगा तो आईसीसी आवाज आई सुनो, रुको... पीछे मुड़कर देखा तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे उन्होंने मेरी शेरवानी पर गुलाब लगाया और शाबाशी दी।

दर्शकों से बनती है कलाकार की असली पहचान
सचिन ने कहा कि आज भी उनका स्वभाव सीखने और नई चीजों को तलाशने का है। उनके अनुसार कलाकार की असली पहचान दर्शकों से बनती है। दर्शक ही कला को स्वीकार कर उसे जीवित रखते हैं। इसलिए एक कलाकार के लिए दर्शक ही उसे आगे बढ़ाने उसे हौसला अफजाई का माध्यम है।

हर उम्र में होती है नई शुरुआत
फिटनेस पर सचिन ने बताया कि वह आज भी रोज शाम चार से छह बजे तक बैडमिंटन खेलते हैं। इसका उद्देश्य जीतना नहीं, बल्कि खुद को स्वस्थ और सक्रिय रखना है। उन्होंने कहा कि उम्र को कभी रुकावट नहीं मानना चाहिए। जीवन में हर दिन को नई शुरुआत की तरह देखना चाहिए।

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जहां खुद सीखने हो झिझक, वहां बच्चों से सीखें
सिनेमा में बदलाव और एआइ जैसी तकनीक पर उन्होंने कहा कि नई चीजें सीखने में संकोच नहीं करना चाहिए। जहां खुद सीखने में झिझक हो, वहां बच्चों से सीखा जा सकता है। उन्होंने परिवार में आपसी सम्मान और समर्पण को जरूरी बताते हुए बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार खेल से जोड़ने की बात कही।

जहाज के कैप्टन की तरह है फिल्म निर्देशक की भूमिका
फिल्म में निर्देशक की भूमिका पर सचिन ने कहा कि निर्देशक जहाज के कैप्टन की तरह होता है और उसे अपनी फिल्म को लेकर स्पष्ट फोकस होना चाहिए। कहा कि हर तरह की जानकारी और बेहतर नजरिया ही निर्देशक की पहचान है। उन्होंने फिल्मों में अश्लीलता से बचने की जरूरत भी बताई।

दर्शक ही कलाकार की ताकत
सचिन ने कहा कि किसी कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका दर्शक होता है। कलाकार कितना भी काम करे, उसकी कला को अर्थ तभी मिलता है जब उसे देखने और समझने वाला दर्शक मौजूद हो। उन्होंने दर्शकों से मिले स्नेह को अपने लंबे सिनेमा सफर की महत्वपूर्ण ताकत बताया।