जागरण फिल्म फेस्टिवल: पर्दे पर दिखा नीब करौरी बाबा का आध्यात्मिक सफर, भक्तिभाव में डूबा सिनेमा हाल
जागरण फिल्म फेस्टिवल में 'हनुमान अंश' फिल्म के जरिए नीब करौरी बाबा के आध्यात्मिक सफर को दर्शाया गया, जिसे देखकर दर्शक भावुक और भक्तिभाव में डूब गए।


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जागरण संवाददाता, देहरादून। सिनेमा हाल में अंधेरा हुआ और पर्दे पर 1964 का कुमाऊं नजर आया तो दर्शक अपनी नजरें स्क्रीन से नहीं हटा सके। जागरण फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन स्पेशल स्क्रीनिंग में विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ दिखाई गई।
नीब करौरी बाबा के जीवन और आध्यात्मिक सफर को पर्दे पर देखते हुए दर्शक कभी भावुक हुए तो कभी भक्तिभाव में डूबे नजर आए। फिल्म के कई दृश्यों के दौरान पूरा हाल ‘सीताराम’ के जयघोष से गूंज उठा। बाबा के आध्यात्मिक अनुभवों और चमत्कारों को देखकर दर्शक शांत भाव से स्क्रीन पर टिके पर्दे पर उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव का दृश्य आता है। बालक लक्ष्मीनारायण अपनी मां के करीब है।
धीरे-धीरे भगवान की तलाश में बदलती है मां की तलाश
मां का निधन होता है तो उसका संसार जैसे अचानक सूना पड़ जाता है। मां को खोने का दर्द और उसे फिर से पाने की चाह में बेचैन बालक को देखकर दर्शकों के चेहरे भी गंभीर हो जाते हैं। कुछ देर के लिए हाल में सन्नाटा छा जाता है। दर्शक उसके दर्द को महसूस करते हुए आगे की कहानी देखने को उत्सुक नजर आते हैं।
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मां की तलाश धीरे-धीरे भगवान की तलाश में बदलती है। लक्ष्मीनारायण घर छोड़कर निकल पड़ता है। रास्ते में साधु-संतों से मुलाकात होती है, अलग-अलग अनुभव सामने आते हैं। पर्दे पर उसकी भटकन देखकर दर्शकों के मन में भी सवाल उठता है कि आखिर यह यात्रा उसे कहां ले जाएगी। हर नए पड़ाव के साथ स्क्रीन पर कहानी आगे बढ़ती है और दर्शक उसके आध्यात्मिक सफर से जुड़ते चले जाते हैं।
फिर कहानी में ऐसे प्रसंग आते हैं, जहां लक्ष्मीनारायण की भक्ति और सेवा का भाव गहराता दिखाई देता है। लोगों की मदद करते हुए उसका स्वरूप बदलता जाता है। इन दृश्यों में दर्शकों के चेहरों पर श्रद्धा नजर आती है। कहीं कोई दृश्य उन्हें भावुक करता है तो कहीं बाबा के प्रति आस्था का भाव उन्हें भीतर तक छू जाता है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, लक्ष्मीनारायण की पहचान नीब करौरी बाबा के रूप में सामने आती है। बाबा के आध्यात्मिक अनुभवों और चमत्कारों को देखकर दर्शक शांत भाव से स्क्रीन पर टिके रहते हैं। प्रेम, सेवा, करुणा और ईश्वर-स्मरण का संदेश जब पर्दे पर उभरता है तो कई दर्शक हाथ जोड़कर बैठ जाते हैं। ‘सीताराम’ का जयघोष फिर पूरे हाल को भक्तिमय कर देता है।
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फिल्म के अंतिम हिस्से में मां को खोकर भगवान की तलाश में निकले बालक से मानव सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाने वाले संत तक की यात्रा दर्शकों के सामने पूरी होती है। पर्दे पर कहानी समाप्त होती है, लेकिन हाल में कुछ देर तक उसका भाव बना रहता है। दर्शकों के चेहरे पर संतोष, श्रद्धा और भावुकता साथ-साथ नजर आया।
