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जागरण फिल्म फेस्टिवल: पहाड़ की धड़कन, कलाकारों का संघर्ष देख भर आईं दर्शकों की आंखें

Published: Sun, 27 Sep 2026 04:13 PM (IST)

जागरण फिल्म फेस्टिवल में यति वंदना त्रिपाठी की फिल्म 'रागा एंड रिलिक्स' का प्रदर्शन हुआ, जिसमें कुमाऊं की लोकपरंपरा और छोलिया नृत्य को बचाने के संघर्ष को दर्शाया गया।

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जागरण संवाददाता, देहरादून। ढोल की थाप शुरू हुई तो सिल्वर सिटी सिनेमाज का माहौल जैसे पहाड़ की चौखट में बदल गया। नगाड़ा ढोल के साथ रणसिंघा की गूंज के बीच पारंपरिक वेशभूषा में थिरकते कलाकारों को देखकर दर्शक कभी तालियों से उनका उत्साह बढ़ाते दिखे तो कभी पर्दे पर चल रही कहानी में खो गए।

जब फिल्म ने इन कलाकारों की मेहनत, संघर्ष और लोकनृत्य छोलिया को बचाए रखने की चिंता दिखाई तो कई दर्शक भावुक भी हो उठे। जागरण फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन यति वंदना त्रिपाठी की निर्देशित ‘रागा एंड रिलिक्स’ ने दर्शकों को कुमाऊं की उस लोकपरंपरा से रूबरू कराया, जो समय के साथ बदलते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़ी है।

1200 कलाकार जुड़े

फिल्म में कुमाऊं खासतौर पर पिथौरागढ़ में छोलिया की बदलती यात्रा को बेहद करीब से दिखाया गया। कभी छोलिया महोत्सव में महज पांच टीमें हिस्सा लेती थीं, लेकिन आज करीब 1200 कलाकार इससे जुड़े हैं और देश-विदेश तक अपनी प्रस्तुति पहुंचा रहे हैं।

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युद्ध के दौरान संकेत देने के माध्यम के रूप में विकसित हुआ यह युद्धपरक नृत्य आज विवाह समारोहों, मेलों और शुभ अवसरों की पहचान बन चुका है। यह बदलाव देखकर दर्शकों को महसूस हुआ कि लोककलाएं समय के साथ अपना रूप बदल सकती हैं, लेकिन उनकी आत्मा परंपरा से ही जुड़ी रहती है।

फिल्म का सबसे भावुक पक्ष कलाकारों की जिंदगी और उनका समर्पण रहा। सीमित संसाधनों के बीच अभ्यास करते कलाकार, अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की चिंता और बदलते दौर में छोलिया के सामने खड़ी चुनौतियां पर्दे पर सामने आईं। इन दृश्यों के दौरान सभागार में कई दर्शक शांत होकर फिल्म देखते रहे। प्रस्तुति के जीवंत दृश्यों पर तालियां गूंजीं तो संघर्ष के दृश्यों ने उन्हें भीतर तक छुआ।

मुनस्यारी के छोलिया कलाकार देवेंद्र राम ने बताया कि प्रस्तुति से पहले देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है और विवाह समारोह में दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद दिया जाता है। वरिष्ठ कलाकार गंगाराम ने रणसिंघा और बड़े नगाड़े के महत्व के साथ छोलिया की 22 रिदम की जानकारी दी। कलाकारों की बातों से दर्शकों को समझ आया कि छोलिया महज नृत्य और संगीत का मेल नहीं, बल्कि आस्था, संस्कार और पहाड़ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है।

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फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के बीच इसके दृश्यों और कलाकारों के संघर्ष की चर्चा होती रही। दर्शकों ने कहा कि छोलिया को पर्दे पर देखकर उन्हें अपनी लोकसंस्कृति की समृद्धि का अहसास हुआ, वहीं कलाकारों की कहानी ने यह सोचने पर मजबूर किया कि परंपराओं को जीवित रखने के पीछे कितनी मेहनत होती है। ‘रागा एंड रिलिक्स’ मनोरंजन से आगे बढ़कर दर्शकों के मन में अपनी लोकजड़ों से जुड़ने का भाव छोड़ गई।