देहरादून, सुमन सेमवाल। मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने अवैध निर्माण की सालों से डंप पड़ी फाइलों की कुंडली बांचने का काम शुरू कर दिया है। इसके लिए पुराने प्रकरणों से संबंधित पत्रावलियों को स्कैन किया जा रहा है। ताकि उन्हें डिजिटल फॉर्मेट में लाकर अवैध निर्माण मैनेजमेंट सिस्टम से जोड़ दिया जाए। इस काम के बाद डंप पड़ी फाइलों में निरंतर तारीखें लगती रहेंगी। हालांकि, इसके साथ ही एमडीडीए के चुनौती भी बढ़ती दिख रही है। इसकी वजह यह है कि एमडीडीए में अवैध निर्माण के 28 हजार, 410 प्रकरण लंबित चल रहे हैं। ऐसे में पुराने मामलों को निपटाने में ही कई साल लग सकते हैं।

एमडीडीए उपाध्यक्ष डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि पुराने प्रकरणों को डिजिटल फॉर्मेट में लाने के लिए नवंबर तक का समय तय किया गया है। इसके बाद जब सभी प्रकरण अवैध निर्माण मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ जाएंगे तो हर एक मामले में तारीख लगाने की अनिवार्यता हो जाएगी। जब तक प्रकरणों पर अग्रिम कार्रवाई नहीं कर ली जाती, तब तक तारीख लगती रहेगी। इस तरह अवैध निर्माण के पुराने से पुराने मामलों का भी निस्तारण होता जाएगा।

हर साल 1283 नए मामले हो रहे दर्ज

एमडीडीए की चुनौती इसलिए भी बढ़ती दिख रही है, क्योंकि हर साल अवैध निर्माण के करीब 1283 नए मामले दर्ज हो रहे हैं। यह भी सच्चाई है कि अधिकतर प्रकरणों का निस्तारण उसी साल संभव नहीं हो पा रहा। यह भी एक बड़ा कारण है कि अवैध मामलों के प्रकरण न सिर्फ बढ़ते चले गए, बल्कि अधिकारियों का ध्यान नए मामलों तक सिमटकर रह गया।

वैध से अधिक हैं अवैध निर्माण

एमडीडीए में वैध निर्माण से कहीं अधिक संख्या अवैध निर्माण की है। अब तक एमडीडीए में महज नौ हजार के करीब ही निर्माण वैध रूप में दर्ज हैं। दूसरी तरफ अवैध निर्माण की संख्या वैध की अपेक्षा तीन गुना से भी अधिक है।

एमडीडीए में अवैध निर्माण की तस्वीर

भवन प्रकृति, संख्या

आवासीय, 16,906

कमर्शियल, 12,300

कुल प्रकरण, 28410

रोजाना एक केस भी निपटाएंगे तो लगेंगे 96 साल

एमडीडीए में अवैध निर्माण के लंबित प्रकरणों में हर दिन (करीब 295 कार्य दिवसों के हिसाब से) एक केस निपटाया जाए तो सभी केसों (अब तक पंजीकृत) के निपटारे में ही 96 साल का समय लग जाएगा। इसी तरह यदि अधिकारी रोजाना 10 केस भी निपटाएं तब भी साढ़े नौ साल का समय लग जाएगा। हालांकि, एमडीडीए अधिकारियों के पास और भी कई काम होते हैं और रोजाना सुनवाई भी संभव नहीं हो पाती है। फिर एक ही सुनवाई में प्रकरणों का निपटारा भी संभव नहीं। इसके अलावा मंडलायुक्त कोर्ट, उडा व हाईकोर्ट में भी याचिका दायर होने पर वाद लंबित हो जाते हैं।

इस तरह निपटारे पर लगने वाला संभावित समय

दैनिक निपटारा, कुल निपटारा, अवधि

10,             2950,  साढ़े 09 साल

09,             2655,  साढ़े 10 साल

08,             2360,  12 साल

07,             2065,  साढ़े 13 साल

06,             1770,   06 साल

05,             1475,   साढ़े 19 साल 

नोट: यह एक आकलन है और 28410 प्रकरणों के दैनिक आधार पर निपटारे की अवधि की संभावना व्यक्त की गई है।

विकासनगर व ऋषिकेश क्षेत्र की चुनौती भी 

एमडीडीए के पास सिर्फ पूर्व के दून क्षेत्र के अवैध निर्माण की चुनौती नहीं है। क्योंकि अब विकासनगर आदि का क्षेत्र दूनघाटी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण के विलय व एचआरडीए से टूटकर एमडीडीए से जुड़े ऋषिकेश क्षेत्र की भी चुनौती भी है। दोनों ही क्षेत्रों में करीब आठ हजार अवैध निर्माण के प्रकरण लंबित चल रहे हैं। वहीं, इन्हीं क्षेत्रों में भविष्य में सर्वाधिक निर्माण की भी संभावना है। ऐसे में अवैध निर्माण के मामले भी बढ़ेंगे और उनके निपटारे की चुनौती को भी कम नहीं आंका जा सकता।

छह अधिकारियों पर सुनवाई का भार

बड़ी संख्या में लंबित अवैध निर्माण के प्रकरणों की जिम्मेदारी एमडीडीए उपाध्यक्ष के अलावा दो सचिव व एक संयुक्त सचिव पर ही है। इसके अलावा विकासनगर व ऋषिकेश के एसडीएम को भी संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो कि पहले ही काम के बोझ तले दबा रहते हैं। क्योंकि इनके पास यह जिम्मेदारी अतिरिक्त रूप से है और इन पर राजस्व संबंधी वादों की सुनवाई के अलावा प्रशासनिक कार्यों की भी जिम्मेदारी होती है।

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33 साल में ऋषिकेश में महज 1100 नक्शे पास

नगर पालिका से नगर निगम बन चुके ऋषिकेश में बीते 33 सालों में महज 1100 के करीब ही नक्शे पास किए गए हैं। यह क्षेत्र एमडीडीए के अधीन आने पर इस सच्चाई का पता चल पाया। अब तक ऋषिकेश क्षेत्र हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (एचआरडीए) का भाग था, मगर राज्य कैबिनेट के निर्णय बाद देहरादून की सीमा वाले ऋषिकेश व रायवाला क्षेत्र को मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) का भाग बना दिया गया। एमडीडीए ने संबंधित क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेने के साथ ही एचआरडीए से दस्तावेज भी मंगाने शुरू कर दिए। एमडीडीए को अब तक ऋषिकेश सेक्टर के दस्तावेज प्राप्त हो चुके हैं।

इस रिकॉर्ड के मुताबिक घनी आबादी में तब्दील हो चुके ऋषिकेश में पिछले तीन दशक में महज 1100 के करीब ही नक्शे पास किए जा सके हैं। वहीं, अवैध निर्माण के करीब 1600 प्रकरण गतिमान हैं। एमडीडीए अधिकारी भी इतनी कम संख्या में नक्शे पास किए जाने पर हैरान हैं। क्योंकि ऋषिकेश के मुख्य क्षेत्र में बड़ी संख्या में निर्माण हो चुके हैं। ऐसे में एमडीडीए अधिकारी इस बात को लेकर भी असमंजस में हैं कि अवैध निर्माण पर अब कार्रवाई कैसे संभव हो पाएगी। हालांकि, प्राधिकरण ने फिलहाल नए हो रहे निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। ताकि भविष्य में अवैध निर्माण पर अंकुश लगाया जा सके।

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एमडीडीए उपाध्यक्ष डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि एचआरडीए से अभी ऋषिकेश से बाहर के दो और सेक्टर की जानकारी मिलनी बाकी है। जैसे-जैसे दस्तावेज मिल रहे हैं, उन्हें सूचीबद्ध किया जा रहा है। कितनी फाइल मिल रही हैं और उनमें प्रत्येक में कितने पृष्ठ हैं, इसका ब्योरा भी दर्ज किया जा रहा है।

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Posted By: Sunil Negi

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