v style="text-align: justify;">देहरादून, [राज्य ब्यूरो]: घर में एक लाख की फौज और फिर भी मानव संसाधन की कमी का राग। उत्तराखंड में कुछ ऐसा ही वन महकमे का हाल। राज्यभर में 12168 वन पंचायतें अस्तित्व में हैं, जिनसे जुड़े हैं 109512 लोग। इसके बावजूद विभाग इस फौज का उपयोग दावानल से निबटने में नहीं कर पा रहा है। हालांकि, ये पंचायतें अपने अधीन करीब 2248 वर्ग किमी क्षेत्र के जंगलों की सुरक्षा करती हैं, मगर आरक्षित और सिविल-सोयम क्षेत्र में उसकी भागीदारी नगण्य है। वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ.हरक सिंह रावत का कहना है कि इस बार अग्निकाल में वन पंचायतों का अहम सहयोग लिया जाएगा। 

उत्तराखंड ऐसा अकेला राज्य है, जहां वन पंचायतें अस्तित्व में हैं। वनों के संरक्षण-संवर्धन के मद्देनजर यह व्यवस्था 1930 के दशक से चली आ रही है। प्रत्येक वन पंचायत में सरपंच समेत नौ सदस्यों की टीम है। वन पंचायतें न सिर्फ अपने अधीन वन क्षेत्रों का संरक्षण करती हैं, बल्कि अग्निकाल में इन्हें आग से बचाने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। 
यह विडंबना ही है कि वन पंचायतों के रूप में एक लाख से ज्यादा लोगों की फौज की उपलब्धता के बावजूद महकमा उसका इस्तेमाल पंचायती वनों से लगे आरक्षित और सिविल-सोयम वन क्षेत्रों में नहीं कर पा रहा है। खासकर फायर सीजन में जंगलों को आग से बचाने के लिहाज से। जानकारों की मानें तो यदि विभाग इस मानव शक्ति का ठीक से उपयोग करे तो उसकी बड़ी दिक्कत हल हो सकती है। इसके लिए उसे वन पंचायतों को सशक्त बनाकर जनसामान्य का भरोसा जीतना होगा। 
उधर, वन मंत्री डॉ.हरक सिंह रावत भी मानते हैं कि वन पंचायतों के रूप में एक बड़ा मानव संसाधन है। उन्होंने कहा कि इस मर्तबा वन पंचायतों पर खास फोकस किया गया है। सभी पंचायतों में विभिन्न कार्यों के लिए बजट की उपलब्धता के साथ ही वहां रोजगारपरक कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे। यही नहीं, दावानल थामने के लिए भी वन पंचायतों का सक्रिय सहयोग लिया जाएगा। उन्हें आरक्षित व सिविल-सोयम क्षेत्रों में भी यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। 

By Raksha Panthari