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हिमालय में घट रहे सल्फेट कण, हर साल 0.0127 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा तापमान... क्या किसी खतरे की है दस्तक?

Published: Wed, 14 Oct 2026 09:30 AM (IST)Updated: Wed, 14 Oct 2026 09:36 AM (IST)

हिमालय में सल्फेट कणों की घटती मात्रा और बढ़ते तापमान के बीच सीधा संबंध पाया गया है। एक नए अध्ययन ...और पढ़ें

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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सुमन सेमवाल, देहरादून। हिमालय में बढ़ते तापमान के पीछे केवल ग्रीनहाउस गैसें ही नहीं, बल्कि वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कणों की बदलती मात्रा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

उत्तर-पश्चिमी हिमालय (लेह, कारगिल और केलांग आदि) पर किए गए एक नए अध्ययन में समुद्र तल से 4000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फेट एरोसोल की मात्रा में गिरावट और सतह के निकट तापमान में वृद्धि के बीच संबंध सामने आया है। विज्ञानियों ने वर्ष 1980 से 2023 तक के 44 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया।

अध्ययन के अनुसार, इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फेट एरोसोल आप्टिकल डेप्थ (एओडी) में औसतन प्रति वर्ष 0.0002 की कमी दर्ज की गई, जबकि तापमान औसतन 0.0127 डिग्री सेल्सियस प्रतिवर्ष बढ़ा। यह शोध पत्र सितंबर 2026 के एटमास्फेरिक पाएल्यूशन रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ है। जो नासा के मेर्रा-2 पुनर्विश्लेषण आंकड़ों पर आधारित है।

सूरज की किरणों को वापस लौटाते हैं सल्फेट कण

शोध के अनुसार सल्फेट एरोसोल वायुमंडल में मौजूद बेहद छोटे कण हैं, जो मुख्य रूप से सल्फर डाइआक्साइड गैस की रासायनिक प्रक्रियाओं से बनते हैं।

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ये कण सूर्य के प्रकाश को बिखेरकर उसका कुछ हिस्सा वापस अंतरिक्ष की ओर भेजते हैं। इससे धरती की सतह तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा कम हो सकती है और ठंडक का प्रभाव पैदा होता है। सल्फेट कण बादलों की बूंदों के निर्माण में भी मदद करते हैं, जिससे बादलों की सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता प्रभावित होती है।

ऊंचाई पर सल्फेट कण इस कारण कम हो रहे

शोधकर्ताओं ने इसके दो प्रमुख संभावित कारण बताए हैं। पहला, अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फर डाइआक्साइड के स्थानीय स्रोत सीमित हैं। दूसरा, नमी सोखने वाले सल्फेट कणों का निचले वायुमंडल से ऊंचाई तक पहुंचना अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकता है।

इसके उलट, तलहटी में औद्योगिक गतिविधियों, ईंधन के इस्तेमाल और अन्य स्रोतों से सल्फर डाइआक्साइड उपलब्ध होने की संभावना अधिक है। वहां वायुमंडल की निचली परत में नमी भी सल्फेट कणों के आकार और उनके टिके रहने को प्रभावित कर सकती है। इससे ऊंचाई वाले क्षेत्रों और तलहटी में सल्फेट एरोसोल के रुझान अलग दिखाई देते हैं।

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