उत्तराखंड में हरीश रावत के तेवरों से थमीं कांग्रेस की सांसें, चुनावी व्यूह रचना संकट में
उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का असंतोष पार्टी की विधानसभा चुनाव रणनीति के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर ...और पढ़ें

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की फाइल फोटो। जागरण
HighLights
हरीश रावत का असंतोष कांग्रेस की चुनाव रणनीति पर भारी।
टिकट बंटवारे में सीमित भूमिका से बढ़ी उनकी बेचैनी।
हाईकमान की सामूहिक नेतृत्व की योजना को चुनौती।
रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ने और नई लीडरशिप को आगे बढ़ाने की व्यूह रचना दरकेगी, या पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के असंतोष को साधकर या नजरअंदाज कर आगे बढ़ा जाएगा, ये सवाल कांग्रेस की परेशानी के नए कारक बन गए हैं। पार्टी के निर्णयों से असहज हरीश रावत (हरदा) ने चुनाव में मात्र चार माह का समय शेष रहते मोर्चा खोल दिया है।
तमाम वरिष्ठों को एकजुट कर भाजपा के मजबूत किले में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस हाईकमान की ओर से तैयार चक्रव्यूह को ढाई दशक तक राज्य में पार्टी को अपने इशारों पर नचाते रहे हरदा की महत्वाकांक्षा से खुली चुनौती मिल रही है। दोनों में टकराव की ये डगर किसी मोड़ पर साथ मिलेगी या रास्ते अलग होने की नौबत आ सकती है, इसे लेकर गहराती आशंका से पार पाना पार्टी के लिए आसान नहीं रहने वाला है।
हरीश रावत ने विगत सोमवार अपनी धन्यवाद और जनसंवाद यात्रा से जिस अंदाज में पार्टी को चुनौती दी है, उससे उत्तराखंड में जीत के लिए छटपटा रही पार्टी अपने लिए मुश्किलें में इजाफा मान रही है। प्रदेश से लेकर जिलों में पार्टी के संगठन से लेकर विधानमंडल दल में वर्तमान में भी रावत समर्थकों या उन्हें पंसद करने वालों की संख्या प्रदेश में कांग्रेस के अन्य किसी भी नेता से अधिक है। राजनीति की अपनी इसी यूएसपी के सहारे ही छठवीं विधानसभा के लिए होने जा रहे चुनाव में मजबूती से खम ठोकने की उनकी इच्छा सामने आई है।
यह अलग बात है कि कांग्रेस नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक जो भी महत्वपूर्ण निर्णय किए हैं, उनसे वह असहज रहे हैं। बढ़ती उम्र के साथ कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति से खुद को दूर रख कर प्रदेश की राजनीति तक रावत का सिमटना हाईकमान को रास नहीं आया। हाईकमान और रावत के बीच संवाद में भी पहले जैसी बात अब नहीं रही।
दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ के लिए कई दिनों के प्रवास के बावजूद उनकी न तो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से भेंट हुई और न ही पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ उन्हें मुलाकात का अवसर मिला। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से भी जो भेंट हुई, उन्हें महज औपचारिक मुलाकात के रूप में ही देखा गया है।
दरअसल, विधानसभा चुनाव के लिए गठित समितियों में हरदा उपेक्षित रहे। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल उनके करीबी हैं, लेकिन अब हाईकमान की रणनीति जमीन पर उतारने के लक्ष्य को ही सर्वोपरि मानकर उनकी चहलकदमी के बाद दोनों के रिश्ते को लेकर पार्टी के लोग ही सशंकित हैं।
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की गिनती सबको साथ लेकर चलने वालों में होती है, लेकिन वह हरीश रावत के यश मैन होंगे, ऐसा मानने वाले कम ही हैं। चुनाव के लिए टिकटों के बंटवारे पर इस समीकरण का खास असर रहना है।
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जानकारों की मानें तो हरीश रावत के खुलकर मोर्चा लेने के पीछे सीटों का गणित बैठाने में उनकी अत्यंत सीमित भूमिका भी है। हाईकमान की हिदायत के बाद भी उन्होंने यात्रा को न केवल आयोजित किया, बल्कि प्रदेश चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह समेत सात विधायकों की भागीदारी सुनिश्चित कर संदेश दिया है। रावत का यह चुनावी नाद पार्टी हाईकमान और उनके विरोधियों को भले ही पसंद नहीं आया, लेकिन इसने पार्टी की एकजुटता की कलई खोलकर रख दी है।
