उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा: मलबे और एवलांच से बढ़ी चुनौतियां
ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर खतरा बढ़ रहा है, जिसमें हैंगिंग ग्लेशियर और पीछे छूटे मलबे से होने वाली तबाही प्रमुख है।

दैनिक जागरण के अकादमिक विमर्श में एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के एचओडी प्रो. एमपीएस बिष्ट ने ग्लेशियरों के संरक्षण पर जानकारी दी।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुमन सेमवाल, देहरादून। ग्लोबल वार्मिंग से उत्तराखंड के ग्लेशियर भी अछूते नहीं हैं। हालांकि, यहां ग्लेशियर झीलों के फटने से अधिक खतरा हैंगिंग ग्लेशियरों से है। इसके अलावा समय के साथ ग्लेशियरों के ऊपर की तरफ खिसकने के कारण पीछे छूटे करोड़ों टन मलबे से भी खतरा निरंतर बना हुआ है।
यह बात एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के एचओडी प्रो. एमपीएस बिष्ट ने दैनिक जागरण के अकादमिक विमर्श में कही।
जागरण के पटेलनगर स्थित कार्यालय में ‘ग्लेशियरों का संरक्षण और संभावित खतरे’ विषय पर आयोजित विमर्श में प्रो. बिष्ट आनलाइन माध्यम से जुड़े। उन्होंने ग्लेशियरों के बनने की प्रक्रिया को सरल भाषा मे समझाने के साथ ही कहा कि ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप) से ग्लेशियर ऊपर की तरफ सिमट रहे हैं।
ग्लेशियरों के पीछे खिसकने से बोल्डरों सहित करोड़ों टन मलबा ढलान वाले क्षेत्रों में जमा हो रहा है। इसके साथ ही ग्लेशियरों का स्वरूप भी बदल रहा है। साउथ ऋषि और नंदा देवी ग्लेशियर, जिनका पहले संगम होता था, वह आज अलग-अलग हो गए हैं।
इससे ग्लेशियर की संख्या तो एक से दो हो गई, लेकिन इनका दायरा सिमट गया। इसी तरह मिलम ग्लेशियर आज आठ-नौ ग्लेशियरों में बंट गया है, क्योंकि इनके कई हिस्सों में खाली जगह शामिल हो गई है।
सिकुड़ रहे ग्लेशियर, इनके क्षेत्रों में निर्माण खतरनाक
वरिष्ठ भूविज्ञानी एवं हिमनद विशेषज्ञ प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार जहां भी ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, वहां पीछे भारी मलबा छूट रहा है। जलवायु परिवर्तन के दौर में जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो एवलांच जैसी घटनाएं भी उसी गति से होती हैं।
यदि कभी ग्लेशियर से बड़ा हिमखंड टूटा तो ढलानों पर जमा भारी मलबा निचले क्षेत्रों में तबाही ला सकता है। ऐसे में एवलांच शूट और इनके क्षेत्रों में निर्माण मौत को दावत देने से अधिक कुछ नहीं।
केदारनाथ में 150 मीटर से अधिक ऊंचे मलबे के ढेर
ग्लेशियर मलबे के खतरों को रेखांकित करते हुए प्रो. बिष्ट ने कहा कि केदारनाथ के ऊपरी भाग में 150 मीटर से अधिक ऊंचे मलबे के ढेर हैं। ऐसा ही मलबा एवलांच या अतिवृष्टि के समय घातक रूप ले सकता है।
वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा इसका उदाहरण है। साथ ही वर्ष 2025 की धराली आपदा भी इसी तरह की अनदेखी का नतीजा है। धराली आपदा में जो मलबा नीचे आया है, वह एक प्रतिशत भी नहीं है। ऐसे में भविष्य के लिए गहरी सीख लेने की जरूरत है।
केदारनाथ में जमीन की क्षमता समझाई तो लगाई गई ग्रेनाइट की टाइल्स
प्रो. बिष्ट ने कहा कि उन्होंने पीएमओ के वैज्ञानिक सलाहकार को केदारनाथ क्षेत्र की जमीन की क्षमता समझाई थी। उन्हें बताया गया था कि यहां की जमीन का 60 मीटर नीचे तक का भाग अस्थिर है, क्योंकि जमीन के भीतर ठोस अवस्था मे बर्फ भी है।
जो तापमान में उतार-चढ़ाव की स्थिति में फैलती और सिकुड़ती है। ऐसे में पूर्व में प्रस्तावित सीमेंट की टाइल्स की जगह ग्रेनाइट की टाइल्स लगाने का निर्णय लिया गया।
केदारताल पर निगरानी की जरूरत
प्रो. बिष्ट ने यह भी बताया कि गंगोत्री के ऊपर केदारताल की विशेष निगरानी की आवश्यकता है, क्योंकि असामान्य मौसमी घटना के दौरान ताल फट सकता है। जिससे मलबे के साथ निचले क्षेत्रों में तबाही मच सकती है।
बुग्यालों में हस्तक्षेप और निचले क्षेत्रों में निर्माण भी खतरनाक
प्रो. बिष्ट ने कहा कि बुग्यालों और निचले क्षेत्रों की भूमि (सिंचित खेती वाली) की मिट्टी की प्रकृति एक समान होती है। वह मौसम के साथ अपना रूप तुरंत बदल देती है। हमारे पूर्वज निचले क्षेत्रों की भूमि को सिर्फ खेती के लिए प्रयोग में लाते थे।
साथ ही बुग्यालों में हस्तक्षेप भी नहीं करते थे। आज उच्च हिमालयी बुग्यालों में मानव दखल बढ़ा है और निचले क्षेत्रों में निर्माण किए जा रहे हैं।
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