देहरादून, सुमन सेमवाल। उत्तराखंड शासन ने गोल्डन फॉरेस्ट की 454 हेक्टेयर भूमि को विभिन्न विभागों के नाम करने के आदेश तो राजस्व सचिव ने जारी कर दिए, मगर इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह संपत्ति संबंधित विभागों को मिल पाएगी। इसकी एक नहीं, बल्कि कई वजह हैं। पहली बात तो सरकार को यही नहीं पता कि गोल्डन फॉरेस्ट की कितनी संपत्ति को खुर्द-बुर्द कर कर उस पर भवन खड़े कर दिए गए हैं और जो भूमि खाली पड़ी भी है, वह कितनी बार बेची और खरीदी जा चुकी है।

जिस 454 हेक्टेयर भूमि को शासन ने सरकारी विभागों के नाम जारी करने के आदेश बुधवार को जारी किए, उस जमीन का पूरा अपडेट तक अधिकारियों को पिछले साल तक मालूम नहीं था। यह आंकड़ा भी तब, जुटाया जा सका, जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किए। दरअसल, गोल्डन फॉरेस्ट की सभी जमीनों को एकमुश्त खरीदने के लिए एक निजी कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में बोली लगाई थी। यह मामला अभी भी कोर्ट में विचाराधीन है और इस पर सुनवाई की अगली तारीख 23 अक्टूबर तय की गई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कोई भी निर्णय सरकार को उल्टे पांव लौटा सकता है। इसके अलावा सरकारी अधिकारियों की ही नाक के नीचे प्रतिबंध के बावजूद एक-एक कर गोल्डन फॉरेस्ट की जमीनों की बिक्री होती रही और जब अब बड़ी संख्या में संपत्ति बेची जा चुकी है, तब विवादित संपत्ति को सरकारी विभाग के नाम करने के आदेश जारी किए जा रहे हैं।

तीन क्षेत्रों में सर्वाधिक कब्जे

गोल्डन फॉरेस्ट की जमीनों पर प्रेमनगर, सुद्धोवाला व सहस्रधारा रोड पर सर्वाधिक अवैध कब्जे किए गए हैं। इन स्थानों पर होटल से लेकर अपार्टमेंट, शिक्षण संस्थान आदि तक खड़े कर दिए गए हैं। कई अधिकारियों व नेताओं के अवैध कब्जे में गोल्डन फॉरेस्ट की जमीनों पर हैं।

...तो अब सरकार में निहित भी नहीं जमीन

कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर तत्कालीन राजस्व सचिव विनोद प्रसाद रतूड़ी यह कह चुके हैं कि अभी गोल्डन फॉरेस्ट की कोई भी जमीन राज्य सरकार में निहित नहीं है। क्योंकि 21 अगस्त 1997 का उपजिलाधिकारी सदर का वह आदेश निरस्त किया जा चुका है, जिसमें इन जमीनों को सरकार में निहित किया गया था। दरअसल, इस आदेश के खिलाफ तब गोल्डन फॉरेस्ट कंपनी ने पूर्ववर्ती राज्य उत्तर प्रदेश की राजस्व परिषद में चुनौती दी थी। जब परिषद ने एसडीएम के आदेश को निरस्त कर दिया तो सरकार हाईकोर्ट चली गई थी। कोर्ट से भी राहत न मिलने पर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की थी। इसके बाद मामला नैनीताल हाईकोर्ट को भेज दिया गया था। हाईकोर्ट से यह प्रकरण उत्तराखंड राजस्व परिषद को भेजा गया। जिसके बाद परिषद ने पूरे केस को गुण-दोष के आधार पर सुनवाई के लिए जिलाधिकारी की कोर्ट को भेज दिया था। यह मामला यहां भी गतिमान है।

गोल्डन फॉरेस्ट की 110 कंपनियों को भी बिक्री का अधिकार नहीं

कुल मिलाकर अभी जो स्थिति दस्तावेजों के आधार पर बन रही है, वह यह है कि जमीनें राज्य सरकार में निहित नहीं हैं और न ही इन जमीनों की बिक्री का अधिकार गोल्डन फॉरेस्ट की कंपनियों को है। वर्ष 1997-98 में सेबी ने गोल्डन फॉरेस्ट की कंपनियों की ओर से खरीदी गई जमीनों को वित्तीय नियमों का उल्लंघन बताया था। उन्होंने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया था। कोर्ट ने गोल्डन फॉरेस्ट कंपनियों के निदेशकों को जमीनों की बिक्री के लिए प्रतिबंधित कर दिया था। साथ ही संपत्ति की जानकारी एकत्रित करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश आरएन अग्रवाल की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी थी। ताकि संपत्ति की नीलामी कराकर निवेशकों का पैसा लौटाया जा सके। कई संपत्तियों को अब तक नीलाम कर उसकी धनराशि सुप्रीम कोर्ट में जमा भी कराई जा चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार जरूरी

बेशक उत्तराखंड शासन ने जल्दबाजी में गोल्डन फॉरेस्ट की संपत्ति को विभागों को आवंटित करने के आदेश जारी कर दिए, मगर इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले कुछ भी करना सरकार को भारी पड़ सकता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश तक जमीनों की खरीद-फरोख्त व उनका आवंटन सिर्फ सरकार की मुश्किलें ही बढ़ाने का काम करेगा।

गोल्डन फॉरेस्ट प्रकरण पर एक नजर

प्रशासन की कार्रवाई से जुड़े बिंदु

  • वर्ष 1997 से पहले गोल्डन फॉरेस्ट की 110 कंपनियों (चिटफंड कंपनी) के माध्यम से दून क्षेत्र में ही 454 हेक्टेयर जमीनें खरीदी गईं।
  • उप जिलाधिकारी सदर ने जेडए एक्ट में एक व्यक्ति को 12.5 एकड़ भूमि की ही खरीद करने के अधिकार नियम के उल्लंघन पर 21 अगस्त 1997 को जमीनों को सरकार में निहित कर दिया।
  • गोल्डन फॉरेस्ट की अपील पर उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद ने एसडीएम के आदेश को निरस्त कर दिया
  • इसके खिलाफ सरकार नैनीताल हाईकोर्ट पहुंची।
  • वर्ष 2005 में नैनीताल हाईकोर्ट ने गोल्डन फॉरेस्ट के हक में निर्णय दिया।
  • इसके खिलाफ सरकार ने वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
  • इसी साल सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण को उत्तराखंड राजस्व परिषद के सुपुर्द कर दिया।
  • वर्ष 2015-16 में परिषद ने उसी रूप में प्रकरण जिलाधिकारी कोर्ट को सुनवाई के लिए सौंप दिया।

 सेबी की कार्रवाई के बिंदु

  • वर्ष 1997-98 में सेबी ने वित्तीय नियमों की अनदेखी पर कार्रवाई शुरू की।
  • प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट में मामला दाखिल किया।
  • वर्ष 2003-04 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश आरएन अग्रवाल की अध्यक्षता में कमेटी गठित की।
  • अब जमीनों की नीलामी के लिए सुप्रीम कोर्ट में वाद गतिमान।

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ऋषिकेश में एमडीडीए का एक्शन, छह निर्माण होंगे सील

ऋषिकेश क्षेत्र को अपने नियंत्रण में लेते ही मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने अवैध निर्माण पर ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू कर दी है। अवैध निर्माण पर 20 चालान किए गए, जबकि छह निर्माण को सचिव एसएल सेमवाल ने सील करने के आदेश भी जारी कर दिए।

गुरुवार को एमडीडीए सचिव एसएल सेमवाल ने ऋषिकेश में अवैध निर्माण पर काटे गए चालान के संबंध में लोगों की सुनवाई की। उन्होंने अवैध निर्माण करने वाले लोगों को हिदायत दी कि वह निर्माण कार्य तत्काल बंद कर दें। यदि चालान के बाद भी निर्माण जारी रहा तो तत्काल सीलिंग आदेश जारी कर दिए जाएंगे। इसके साथ ही संबंधित लोगों से स्वामित्व संबंधी अभिलेख भी मांगे गए। ताकि स्पष्ट हो सके कि जो लोग कंपाउंडिंग कराने आ रहे हैं, वह संपत्ति के वास्तविक स्वामी हैं भी या नहीं।

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सचिव ने बताया कि ऋषिकेश क्षेत्र से प्राप्त अब तक के रिकॉर्ड के मुताबिक अवैध निर्माण के करीब 1600 प्रकरण गतिमान हैं। इन पर भी त्वरित कार्रवाई शुरू कर दी गई है। संबंधित लोग निर्धारित मानकों के अनुरूप अपने निर्माण की कंपाउंडिंग करा लें और उससे बाहर के निर्माण को स्वत: ही ध्वस्त कर दें।

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Posted By: Sunil Negi

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