उत्तराखंड में रैगिंग रोकने के दावे हवा, प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज में आया सनसनीखेज मामला
दून मेडिकल कॉलेज में रैगिंग रोकने के दावे खोखले साबित हो रहे हैं, जहां अब पानी पीने को लेकर एक ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी दून मेडिकल कॉलेज में रैगिंग रोकने के तमाम दावे और समितियां सवालों के घेरे में हैं। एक के बाद एक शिकायतें सामने आ रही हैं और हर बार जांच की औपचारिकता के बाद मामला शांत पड़ता दिखता है।
जनवरी 2025 में जूनियर छात्र को बेल्ट से पीटने और मार्च 2026 में बाल-दाढ़ी कटवाने का दबाव बनाने की शिकायत आई। अब पीजी प्रथम वर्ष के एक डॉक्टर ने महज गिलास से पानी पीने को लेकर दो सीनियरों पर प्रताड़ना और धमकी देने का आरोप लगाया है।
कॉलेज की एंटी रैगिंग व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न
मामलों की यह कड़ी सिर्फ छात्रों के व्यवहार पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि दून मेडिकल कॉलेज की एंटी रैगिंग व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। अगर नियम, समितियां और कार्रवाई के प्रविधान मौजूद हैं तो फिर जूनियरों को बार-बार शिकायत लेकर बाहर क्यों जाना पड़ रहा है।
दून मेडिकल कॉलेज में लगातार सामने आ रहे मामलों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि एंटी रैगिंग व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है। एक शिकायत के बाद जांच समिति सक्रिय होती है, कार्रवाई की बात होती है, लेकिन कुछ ही समय बाद नया मामला सामने आ जाता है। इसका मतलब साफ है कि संस्थान में जूनियर और सीनियर के बीच शक्ति-प्रदर्शन का असंतुलन अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
यह भी पढ़ें- दून मेडिकल कालेज में रैगिंग का मामला : दोषी MBBS छात्र कक्षा से निलंबित, जुर्माना भी लगाया
रैगिंग पर जीरो टालरेंस का दावा तभी विश्वसनीय होगा जब शिकायत आने का इंतजार करने के बजाय हास्टल, विभागों व डिसेक्शन हाल समेत संवेदनशील स्थानों पर नियमित निगरानी, शिकायतकर्ता की सुरक्षा और दोषी पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित हो।
मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर तैयार होते हैं, यहां अगर प्रशिक्षण की शुरुआत ही डर और दबाव से होगी तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। नियमों में दंड की कमी नहीं है, असली सवाल उनके निष्पक्ष और लगातार इस्तेमाल का है।
पहले मारपीट, फिर बाल-दाढ़ी और अब पानी
- जनवरी 2025 में 2025 बैच के एक छात्र ने 2023 और 2024 बैच के सीनियर छात्रों पर मारपीट, बेल्ट से पीटने, बाल काटने के लिए मजबूर करने और हास्टल के बाहर सोने को कहने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। मामले की जांच हुई और रिपोर्ट के अनुसार 24 छात्रों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तथा नौ छात्रों को हास्टल से निष्कासित किया गया।
- मार्च 2026 में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के एक छात्र ने फैकल्टी और पीजी चिकित्सकों पर रैगिंग का आरोप लगाया। शिकायत में बाल और दाढ़ी कटवाने का दबाव बनाने की बात सामने आई। मामला फिर एंटी रैगिंग कमेटी के हवाले हुआ।
- अब 19 अगस्त को एनाटमी विभाग के डिसेक्शन हाल में पीजी प्रथम वर्ष के डॉक्टर से रैगिंग का मामला सामने आया है। आरोप है कि सामान्य गिलास से पानी पीने को लेकर सीनियर डॉक्टर नाराज हुए और जूनियर को प्रताड़ित किया तथा धमकी दी। पीड़ित ने एनएमसी में शिकायत की, जिसके बाद कॉलेज ने जांच एंटी रैगिंग सेल को सौंप दी।
नियम सख्त, फिर भी व्यवस्था कमजोर
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के 2021 के चिकित्सा महाविद्यालयों में रैगिंग की रोकथाम एवं निषेध संबंधी विनियम रैगिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित करते हैं। यह प्रतिबंध केवल कक्षा तक सीमित नहीं है; शैक्षणिक परिसर, हास्टल, खेल परिसर, कैंटीन व परिसर से बाहर छात्रों की गतिविधियां भी इसके दायरे में आती हैं।
एनएमसी के नियमों में मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना, अभद्र व्यवहार, भय पैदा करना व किसी जूनियर से ऐसा काम करवाना जिससे उसे अपमान या मानसिक क्षति हो, उसे रैगिंग की श्रेणी में रखा गया है। यानी रैगिंग साबित होने के लिए मारपीट होना जरूरी नहीं है।
मानसिक प्रताड़ना व अपमानजनक व्यवहार भी इसके दायरे में आ सकते हैं। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर संस्था स्तर पर कक्षाओं और शैक्षणिक सुविधाओं से निलंबन, छात्रवृत्ति रोकना, परीक्षा में बैठने से रोकना, परिणाम रोकना और अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसे दंड का प्रविधान है।
यूजीसी के नियम भी हैं सख्त
यूजीसी के नियम भी किसी छात्र को डराने, अपमानित करने, मानसिक या शारीरिक परेशानी पहुंचाने अथवा दबाव डालने वाली गतिविधियों को रैगिंग मानते हैं और संस्थानों को दोषी तथा रैगिंग में मदद करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए बाध्य करते हैं।
