छात्र संघ चुनाव: नारे पुराने, नई पीढ़ी के मतदाता... छात्रसंघ चुनाव में जेन-जी फैक्टर
देहरादून के छात्रसंघ चुनावों में इस बार पुरानी छात्र राजनीति और जेन-जी मतदाताओं की बदलती सोच के बीच मुकाबला है। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
सुकांत ममगाईं, देहरादून। छात्रसंघ चुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ प्रत्याशियों का नहीं, पुरानी छात्र राजनीति और नई पीढ़ी की बदलती चुनावी सोच का भी है। डीएवी, डीबीएस, एमकेपी और एसजीआरआर पीजी कालेज में जेन-जी मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे।
ऐसे में अभाविप और एनएसयूआइ जैसे संगठनों के सामने चुनौती केवल अपना संगठनात्मक आधार मजबूत रखने की नहीं, बल्कि ऐसी पीढ़ी तक पहुंच बनाने की भी है जो जानकारी, संवाद और अपनी पसंद के लिए पारंपरिक सीमाओं से आगे निकल चुकी है।
जेन-जी को किसी एक राजनीतिक खांचे में रखना आसान नहीं है। इस पीढ़ी के लिए संगठन की पहचान महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, उसके मुद्दे और छात्रों के बीच उसकी उपलब्धता भी उतनी ही अहम हो सकती है। यही वजह है कि इस बार कैंपस में यह सवाल भी चर्चा में है कि वोट संगठन के नाम पर पड़ेगा या उस चेहरे के नाम पर, जो छात्र की समस्या के समय सबसे पहले दिखाई देता है।
यह भी पढ़ें- एमपीजी कॉलेज मसूरी छात्रसंघ चुनाव गतिरोध समाप्त 29 सितंबर को ही होंगे चुनाव
छात्रसंघ चुनाव का असर परिसर से बाहर भी देखा जाता है। अभाविप का संबंध भाजपा और एनएसयूआइ का कांग्रेस से होने के कारण मुकाबले में बड़े राजनीतिक संगठनों की छाया भी मौजूद है। पर छात्रसंघ चुनाव को विधानसभा चुनाव का जनमत मानना उचित नहीं होगा। फिर भी इन चुनावों से युवा मतदाताओं के बीच संगठनों की पहुंच, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और नई पीढ़ी के मुद्दों से संवाद के कुछ संकेत जरूर मिल सकते हैं।
मोबाइल की स्क्रीन से मतपेटी तक
जेन-जी के लिए चुनाव प्रचार का मैदान केवल परिसर नहीं रहा। सामाजिक माध्यमों पर सक्रियता, छोटे वीडियो, संदेश और सीधे संवाद के जरिए प्रत्याशी छात्रों तक पहुंच रहे हैं। लेकिन डिजिटल पहुंच अपने आप में वोट में बदलती है या नहीं, यह चुनाव परिणाम ही बताएगा।
इस पीढ़ी के सामने कैंपस के सवाल भी सीधे हैं, मसलन फीस कितनी है, परीक्षा समय पर होगी या नहीं, परिणाम कब आएगा, छात्रावास मिलेगा या नहीं, पुस्तकालय और कक्षाओं की स्थिति कैसी है और पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर क्या हैं।
यह भी पढ़ें- डीएवी पीजी कॉलेज छात्रसंघ चुनाव: बारिश में भी नहीं थमा जोश, प्रत्याशियों का जोरदार शक्ति प्रदर्शन
संगठन का झंडा या प्रत्याशी का चेहरा
डीएवी, डीबीएस, एमकेपी और एसजीआरआर में अभाविप और एनएसयूआइ से जुड़े प्रत्याशी मैदान में हैं। दोनों संगठनों की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि और कैंपस में स्थापित पहचान है। लेकिन जेन-जी मतदाताओं की मौजूदगी इस मुकाबले को केवल संगठन बनाम संगठन तक सीमित नहीं रहने देती।
जिस प्रत्याशी का संगठन मजबूत है, क्या वही मजबूत होगा या वह चेहरा आगे निकलेगा जिसकी छात्रों तक व्यक्तिगत पहुंच ज्यादा है।
‘तुरंत जवाब’ चाहती पीढ़ी
नई पीढ़ी के चुनावी व्यवहार की एक खास बात संवाद की गति भी है। छात्र समस्याओं पर तत्काल प्रतिक्रिया और सीधे संवाद की अपेक्षा करते हैं। ऐसे में केवल चुनाव के दौरान दिखाई देने वाला प्रत्याशी व पूरे वर्ष परिसर में सक्रिय रहने वाला चेहरा, दोनों के बीच फर्क भी चुनावी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।
