देहरादून में 157 साल पुरानी रामलीला परंपरा, लाला जमुनादास ने रखी थी नींव
देहरादून में 1868 में लाला जमुनादास 'भक्त' ने रामलीला मंचन की नींव रखी, जो आज भी जारी है। यह 157 ...और पढ़ें

यह तस्वीर एआई से बनाई गई है
HighLights
1868 में लाला जमुनादास 'भक्त' ने रामलीला शुरू की।
मुस्लिम समाज भी शोभायात्रा में सक्रिय भागीदारी निभाता रहा है।
लंका दहन का स्थल तालाब से स्कूल मैदान में बदला।
सुमित थपलियाल, जागरण देहरादून। देश जब अंग्रेजों की गुलामी में जकड़ा था, तब देहरादून में भगवान श्रीराम की लीलाओं के मंचन से आस्था और संस्कृति की एक परंपरा शुरू हुई, जो आज भी कायम है।
वर्ष 1868 में लाला जमुनादास ‘भक्त’ ने श्री रामलीला कला समिति की स्थापना कर दून में रामलीला मंचन की नींव रखी। तब से नवरात्र में शुरू होने वाली यह परंपरा समय के साथ आगे बढ़ती रही। मंच और प्रस्तुति की शैली बदली, लेकिन रामलीला देखने का उत्साह बरकरार है।
देवबंद से देहरादून आए लाला जमुनादास
समिति के अध्यक्ष राकेश स्वरूप महेंद्रू बताते हैं कि सहारनपुर के देवबंद से देहरादून आए लाला जमुनादास ‘भक्त’ ने श्री गुरु राम राय दरबार साहिब के ब्रह्मलीन महंत 1008 श्री नारायण दास के संरक्षण में रामलीला बाजार स्थित श्रीरामलीला भवन में मंचन शुरू कराया।
वर्तमान में श्रीमहंत देवेंद्र दास महाराज का समिति को आशीर्वाद प्राप्त है। दर्शकों की संख्या बढ़ने पर रामलीला कुछ वर्ष शिवाजी धर्मशाला में भी आयोजित हुई, फिर अपने पुराने स्थल पर लौट आई।
दोहा-चौपाई से संवादों तक का सफर
शुरुआत में तुलसीकृत रामचरितमानस की चौपाइयों से लीला का मंचन होता था। बाद में लाला जमुनादास ‘भक्त’ ने तुलसीकृत और स्वयं रचित चौपाइयों से ‘लीला रामायण’ तैयार की। आगे चलकर संवाद और नाट्य शैली जुड़ी। पहले स्थानीय कलाकार निश्शुल्क अभिनय करते थे। वर्ष 2000 से वृंदावन के करीब 25 कलाकार मंचन कर रहे हैं।
शोभायात्रा में मुस्लिम समाज की भागीदारी
रामलीला की शोभायात्राओं में मुस्लिम समाज के लोग भी शामिल होते थे। स्व. मास्टर अल्ताफ हुसैन के पिता निश्शुल्क बैंड बजाते थे। बाद में मास्टर अल्ताफ ने भी यह परंपरा आगे बढ़ाई। आज भी अल्ताफ जनता ब्रास बैंड समिति की शोभायात्रा में सेवाएं देता है।
तालाब से स्कूल मैदान तक पहुंचा लंका दहन
श्री दरबार साहिब परिसर स्थित तालाब के पास होने वाला लंका दहन देखने दूर-दूर से लोग आते थे। वर्ष 2020 में यहां अंतिम बार आयोजन हुआ। इसके बाद अनुमति नहीं मिलने के कारण अब लक्ष्मण चौक स्थित हिंदू नेशनल स्कूल के मैदान में लंका दहन होता है।
तीन पीढ़ियों से महेंद्रू परिवार की सेवा
समिति की अध्यक्षता पहले साधुराम महेंद्रू ने, फिर उनके बेटे स्व. भगवत स्वरूप महेंद्रू ने संभाली। पिछले करीब 12 वर्षों से राकेश स्वरूप महेंद्रू अध्यक्ष हैं और परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
