ढलान से देहरादून में एंट्री तक ट्रकों की ‘अग्निपरीक्षा’, वाहन हो रहे बेकाबू... नहीं रुक रहे हादसे
आशारोड़ी-मोहब्बेवाला में भारी वाहन बेकाबू होकर दूसरे वाहनों के लिए खतरा बन रहे हैं, जिससे लगातार सड़क हादसे हो रहे ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर डाट काली मंदिर की सुरंग पार करने व दून में प्रवेश करते ही भारी वाहनों के लिए सड़क का चरित्र बदल जाता है। लंबी ढलान से उतरता ट्रक पहले ही रफ्तार पकड़ चुका होता है और कुछ ही दूरी पर उसे चेकपोस्ट, कट, स्थानीय यातायात और आबादी वाले हिस्से का सामना करना पड़ता है।
यहां गलती की गुंजाइश कुछ सेकेंड की रह जाती है। यही वजह है कि आशारोड़ी और मोहब्बेवाला के बीच हादसों का सिलसिला अब सिर्फ ‘ब्रेक फेल’ की कहानी नहीं रह गया है, बल्कि सड़क की पूरी सुरक्षा संरचना पर सवाल खड़े कर रहा है। मंगलवार को आशारोड़ी चेकपोस्ट पर सीमेंट लदे ट्रक ने पुलिस बस को पीछे से टक्कर मार दी।
हादसे में कई पुलिसकर्मी घायल हुए। खास बात यह है कि एक हफ्ते के भीतर इसी क्षेत्र में यह दूसरा बड़ा ट्रक हादसा है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जहां लगातार भारी वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हों, वहां सड़क की दोबारा तकनीकी जांच होनी चाहिए। ढलान, मोड़, दृश्यता, सड़क की सतह, यातायात का मिश्रण और वाहनों की गति का संयुक्त अध्ययन जरूरी है।
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ढलान के बाद सबसे खतरनाक कुछ सौ मीटर
इस हिस्से की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रक की गति कम होने से पहले ही सड़क पर वाहनों की संख्या और गतिविधियां बढ़ जाती हैं। चेकपोस्ट, स्थानीय कट व दून की ओर बढ़ता यातायात भारी वाहन के लिए अचानक प्रतिक्रिया वाला क्षेत्र बना देते हैं। मोहब्बेवाला में पहले भी सीमेंट, चीनी और मार्बल से लदे ट्रक अनियंत्रित होकर पलट चुके हैं। फरवरी में ट्रक के कार पर पलटने से आग तक लग गई थी, जबकि दिसंबर में ट्रक कई वाहनों को टक्कर मारते हुए दुकानों में जा घुसा था।
आधे किलोमीटर की रंबल स्ट्रिप भी नहीं बन सकी ढाल
हादसों के बाद इस हिस्से में करीब आधा किलोमीटर रंबल स्ट्रिप लगाई गई थी, लेकिन इसके बावजूद दुर्घटनाएं जारी हैं। यानी सवाल अब यह नहीं है कि ‘चेतावनी दी गई या नहीं’, बल्कि यह है कि क्या चेतावनी उस गति को वास्तव में कम कर पा रही है, जिस गति से भारी वाहन ढलान से नीचे पहुंच रहा है।
प्रशासन की ओर से पूर्व में की गई तकनीकी जांच में भी करीब 3.5 किलोमीटर के लगातार ढलान वाले हिस्से पर अलग-अलग अंतराल में रंबल स्ट्रिप, गति सीमा संकेतक, खतरे के निशान, गति उल्लंघन प्रदर्शन प्रणाली और अतिरिक्त प्रकाश व्यवस्था की जरूरत बताई गई थी।
‘पहले गति खत्म करो, फिर ट्रैफिक मिलाओ’
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ व पूर्व परिवहन उपायुक्त सुधांशु गर्ग के अनुसार भारी वाहनों को ढलान के अंतिम हिस्से में पहुंचने से पहले ही नियंत्रित गति में लाने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए केवल बोर्ड पर्याप्त नहीं हैं। ढलान की शुरुआत से चरणबद्ध गति नियंत्रण, भारी वाहनों के लिए अलग लेन, चेकपोस्ट से पहले पर्याप्त दूरी पर गति जांच और आपात स्थिति में वाहन को सुरक्षित रोकने की व्यवस्था जरूरी है।
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ढलान से पहले चाहिए रोकथाम
दिलचस्प यह है कि प्रशासन पहले ही इस हिस्से को दुर्घटना की दृष्टि से संवेदनशील मान चुका है व तकनीकी जांच के निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद अक्टूबर की शुरुआत में लगातार हादसे सामने आना बताता है कि कागज पर तैयार सुरक्षा खाका और सड़क पर लागू सुरक्षा व्यवस्था के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।
हैरानी की बात यह भी है कि पिछले हफ्ते ही डीएम के आदेश पर इस क्षेत्र में 24 घंटे टास्क फोर्स की तैनाती की गई है, जिसे हर भारी वाहन की चेकिंग के आदेश दिए गए। मंगलवार को हुए हादसे के बाद टास्क फोर्स को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
