विकास धूलिया, देहरादून। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत लगातार अलग-अलग जिलों में कोरोना संक्रमितों से जाकर मिल रहे हैं। पहले बागेश्वर और अब उत्तरकाशी में तीरथ पीपीई किट पहनकर कोरोना वार्ड में गए और वहां दाखिल व्यक्तियों का हाल जाना। यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि अब तक तो कोई अन्य मुख्यमंत्री ऐसा करता दिखा नहीं है। इसे महामारी की चपेट में आए संक्रमितों के प्रति संवेदनशीलता ही कहेंगे, लेकिन साथ ही कोरोना के इस भयावह दौर में ग्राउंड जीरो पर जाकर हेल्थ सिस्टम की परख का यह तरीका सबका ध्यान भी खींचता है। गुजरी 10 मार्च को जब तीरथ ने सरकार की कमान संभाली थी, तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि वह सबसे कठिन दौर में सरकार का नेतृत्व करने जा रहे हैं। हालांकि शुरुआत में कुछ मौकों पर उन्हें असहज स्थिति का सामना जरूर करना पड़ा, लेकिन लगता है अब तीरथ ने राह पकड़ ली है।

किशोर को बड़ा बनने से रोकने वाला कौन

नाम भले ही किशोर, लेकिन हैं वह कांग्रेस के परिपक्व नेता। किशोर उपाध्याय सूबाई सरकार में मंत्री रहे और संगठन के मुखिया का पद भी संभाल चुके हैं। पिछले कुछ वक्त से खुद को पार्टी में साइडलाइन महसूस कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबियों में शुमार, लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि अब बीच में खाई है। कब तक दबी रहती, आखिर दिल की बात जबान से फूट ही पड़ी। दरअसल, पांच-सात साल से राज्यसभा सीट के कांग्रेसी दावेदारों में इन्हें शुमार किया जाता रहा, मगर हर बार बाजी कोई और मार गया। पहले आलाकमान ने पैराशूट के जरिये राज बब्बर को उच्च सदन भिजवा दिया, अगली बार किशोर को किनारे लगा प्रदीप टमटा को आगे कर राज्यसभा भेज दिया गया। दोनों दफा हरीश रावत ही मुख्यमंत्री थे। अब किशोर को लगता है कि कोई तो उन्हें बड़ा नेता नहीं बनने देना चाहता। समझ गए न।

असम फार्मूले ने खिलाई पूर्व कांग्रेसियों की बाछें

उत्तराखंड में सात-आठ महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा यहां भी असम फार्मूला अमल में ला सकती है। असम में भाजपा ने बगैर चेहरा प्रोजेक्ट किए चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। फिर सर्वानंद सोनोवाल के बजाय पार्टी ने हिमंता बिस्व सरमा पर भरोसा जता उनकी मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी कर दी। असम फार्मूले की सुगबुगाहट महसूस कर उत्तराखंड की मौजूदा भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, सुबोध उनियाल, यशपाल आर्य की उम्मीदें भी परवान चढऩे लगी हैं। दरअसल, असम में मुख्यमंत्री बनाए गए बिस्व सरमा पहले कांग्रेस में थे और वर्ष 2015 में ही भाजपा में शामिल हुए। अब अपने ऊपरवाले चारों मंत्री भी पिछले पांच साल के दौरान ही कांग्रेस का दामन झटक भाजपा में शामिल हुए हैं। अब अगर बात मुख्यमंत्री पद की हो तो फिर असम फार्मूले के नाम पर बाछें खिलना तो बनता ही है।

हरदा बोले, आक्सीमीटर माप रहा भिंडी की रीडिंग

यूं तो उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्रियों की भरमार है, लेकिन इनमें से विपक्ष में रहते जिस एक पूर्व मुख्यमंत्री ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी, वह हैं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत, यानी हरदा। इनकी टिप्पणियां होती ही इस कदर चटपटी हैं कि अकसर चर्चा में आ जाती हैं। हाल ही में इन्होंने सूबे की भाजपा सरकार पर यह कहकर तंज कस डाला कि इसके द्वारा कोरोना संक्रमितों में आक्सीजन लेवल की जांच के लिए बंटवाए गए आक्सीमीटर में आप अंगुली डालें या फिर भिंडी, दोनों की रीडिंग एक ही आती है। दरअसल, रावत का इशारा घटिया आक्सीमीटर की खरीद की ओर था और इसी बहाने उन्होंने सरकार को भी कठघरे में ला खड़ा किया। फिर कोरोना काल में भाजपा के केवल सेवा भाव के काम पर हरदा की चुटकी। बोले, इनमें केवल सरकारी भाव ही है, अब चुनावी भाव के लिए सेवा भाव की आड़ ली जा रही है।

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Edited By: Sunil Negi