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चमोली में भूकंप से वैज्ञानिक सतर्क, हिमालयी क्षेत्र में ऊर्जा संचय का संकेत

Published: Thu, 08 Oct 2026 11:57 PM (GMT+05:30)

चमोली में 4.8 तीव्रता का भूकंप हिमालय के मेन सेंट्रल थ्रस्ट क्षेत्र में दर्ज हुआ है, जो अतीत में बड़े ...और पढ़ें

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HighLights

  1. चमोली में 4.8 तीव्रता का भूकंप, मेन सेंट्रल थ्रस्ट क्षेत्र में।

  2. भूगर्भ में ऊर्जा संचित होने से बड़े भूकंप की आशंका।

  3. 1999 के विनाशकारी भूकंप क्षेत्र में फिर हलचल दर्ज।

सुमन सेमवाल, देहरादून। चमोली में सोमवार रात आया 4.8 तीव्रता का भूकंप हिमालय के उस बेहद संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र में दर्ज हुआ है, जहां अतीत में बड़े और नुकसानदायक भूकंप आ चुके हैं। रात 10 बजकर 23 मिनट 12 सेकंड पर आया भूकंप का क्षेत्र मेन सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) की संरचनात्मक पट्टी के निकट है।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानी डा नरेश कुमार के अनुसार यह हलचल बताती है कि भूगर्भ में ऊर्जा जमा हो रही है। यह कितनी बाहर निकली है, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस पूरे क्षेत्र में कभी भी विशाल भूकंप आया सकता है। ऐसे में भवन निर्माण के मानक कड़े करने की जरूरत है।

1999 में इसी व्यापक क्षेत्र ने देखा था बड़ा भूकंप

मौजूदा भूकंप का केंद्र 1999 के भूकंप के बिल्कुल उसी बिंदु पर नहीं है, लेकिन दोनों चमोली के उसी व्यापक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में आते हैं। 29 मार्च 1999 को करीब 6.6 तीव्रता का चमोली भूकंप आया था।

इसका केंद्र चमोली-पिपलकोटी क्षेत्र में था और गहराई करीब 15 किलोमीटर बताई गई थी। वैज्ञानिक अध्ययनों में इस भूकंप से हुए नुकसान का संबंध एमसीटी के आसपास की भूगर्भीय संरचनाओं से पाया गया था।

1999 की घटना महज झटका नहीं थी, बल्कि बड़े पैमाने पर तबाही लेकर आई थी। विभिन्न वैज्ञानिक एवं संस्थागत रिकॉर्ड में करीब 100 से अधिक मौतें और सैकड़ों लोगों के घायल होने का उल्लेख है। हजारों मकानों को नुकसान पहुंचा। चमोली, गोपेश्वर, नंदप्रयाग, पिपलकोटी और आसपास के क्षेत्रों में भारी क्षति हुई।

भूस्खलन, चट्टान खिसकने, सड़क टूटने और जमीन में दरारें पड़ने जैसी घटनाएं भी दर्ज हुईं। विज्ञानी सर्वेक्षण में यह भी पाया गया है कि वर्ष 1999 में एमसीटी के निकट नुकसान सबसे अधिक रहा। कुछ स्थानों पर जमीन में लंबी दरारें पड़ीं और भूस्खलन हुए। चमोली क्षेत्र के प्रभावित हिस्से में अत्यधिक क्षति का क्षेत्र करीब 580 वर्ग किलोमीटर तक आंका गया था।

2017 में फिर हिला था यही केंद्रीय हिमालयी क्षेत्र

इसके बाद 6 फरवरी 2017 को रुद्रप्रयाग क्षेत्र में 5.8 तीव्रता का भूकंप आया था। इसका केंद्र करीब 33 किलोमीटर गहराई में था। झटके दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के बड़े हिस्से में महसूस किए गए। चमोली में कुछ मकानों की दीवारों और छतों में मामूली दरारों की रिपोर्ट आई थी, लेकिन बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान नहीं हुआ।

वाडिया संस्थान के अध्ययन के अनुसार 2017 का 5.7 मैग्नीट्यूट का भूकंप मुनस्यारी थ्रस्ट पर आया था, जिसे एमसीटी का हिस्सा माना जाता है। संस्थान ने इसे 1999 के चमोली भूकंप के केंद्र से करीब 24 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बताया।

10 किमी गहराई ने बढ़ाया वैज्ञानिक महत्व

सोमवार रात का भूकंप करीब 10 किलोमीटर की उथली गहराई पर आया। ऐसे भूकंप समान तीव्रता के अधिक गहरे भूकंपों की तुलना में सतह पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। हालांकि केवल 4.8 तीव्रता और उथली गहराई के आधार पर किसी बड़े भूकंप की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

चमोली क्षेत्र की भूकंपीय स्थिति पर वाडिया के शोध में गंभीर संकेत मिले हैं। संस्थान के अध्ययन में चमोली क्षेत्र के नीचे 12–14 किलोमीटर की गहराई पर तनाव से जुड़ी असामान्यताएं और मध्यम से मजबूत भूकंपों तथा स्वार्म गतिविधि की मौजूदगी दर्ज की गई है। अध्ययन में इस क्षेत्र को लगातार निगरानी की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया है।

एमसीटी की पट्टी में इस कारण इतना दबाव

हिमालय भारतीय प्लेट के उत्तर की ओर बढ़कर यूरेशियाई प्लेट के नीचे धंसने की प्रक्रिया से बना सक्रिय पर्वतीय क्षेत्र है। इसी प्लेट अभिसरण से एमसीटी, मुनस्यारी थ्रस्ट और अन्य प्रमुख भूगर्भीय संरचनाओं पर लगातार तनाव बनता है। चमोली क्षेत्र में भूकंपों का संबंध इन्हीं सक्रिय संरचनाओं और उनके नीचे मौजूद गहरे थ्रस्ट सिस्टम से पाया गया है।

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