देहरादून, [केदार दत्त]: उत्तराखंड में कुछ दिन की राहत के बाद जंगलों के सुलगने का क्रम शुरू हो गया है। इसी के साथ वन महकमे की पेशानी में पड़े बल और खिंचने लगे हैं। असल में राज्य में 37,99,960 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगलों की आग बुझाने को सरकार ने सिर्फ 12 करोड़ रुपये की राशि ही विभाग को मुहैया कराई है। इस लिहाज से देखें तो प्रति 3.16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के हिस्से में एक करोड़ की राशि आ रही है।

सूबे में वनों की सुरक्षा का विषय राज्य का है और उसे ही इसके लिए प्रभावी ढंग से कदम उठाने हैं। फिर चाहे वह अवैध पातन रोकने की बात हो अथवा वृक्षारोपण या फिर फायर सीजन में वनों को आग से बचाने की। 

फायर सीजन की ही बात करें तो उत्तराखंड में हर साल ही बड़े पैमाने पर वन संपदा आग की भेंट चढ़ जाती है। गत वर्ष तो आग ने विकराल रूप धारण किया, मगर इससे सबक लेने की जरूरत नहीं समझी गई।

अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि वन विभाग की ओर से इस साल जंगल की आग से निबटने के लिए वन महकमे की ओर से 48 करोड़ रुपये के बजट की मांग सरकार से की गई। लेकिन, इसके सापेक्ष विभाग को अब तक महज 12 करोड़ रुपये मिले हैं। 

हालांकि, विभाग ने यह राशि सभी वन प्रभागों के साथ ही पार्क व सेंचुरी प्रशासन को आवंटित कर दी है। लेकिन, यह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है।

आग बुझाने को विभाग ने चार माह के लिए करीब 6000 श्रमिक तैनात किए हैं। इन्हें प्रतिमाह छह हजार रुपये मानदेय देने को ही 3.60 करोड़ रुपये की जरूरत है। साथ ही संसाधन भी जुटाए जाने हैं। ऐसे में इतने कम बजट में व्यवस्थाएं कैसे हो पाएंगी, यही चिंता विभाग को सता रही है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक आरके महाजन का कहना है कि जंगलों की आग बुझाने के लिए सरकार से और बजट की मांग की गई है।

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Posted By: Bhanu

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