देहरादून, जेएनएन। दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्लाज्मा थेरेपी अपने अगले चरण की तरफ नहीं बढ़ पा रही है। अभी तक अस्पताल में छह लोग प्लाज्मा दान करने पहुंचे, लेकिन इनमें से किसी में भी पर्याप्त एंटीबॉडी नहीं मिली हैं। जिस कारण सभी छह डोनर रिजेक्ट कर दिए गए हैं। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि और कई डोनर से संपर्क किया गया है। डोनर में पर्याप्त एंटीबॉडी मिलते ही प्लाज्मा थेरेपी शुरू कर दी जाएगी।

प्रदेश में कोरोना का पहला मामला पंद्रह मार्च को सामने आया था। यह पहला मरीज दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती हुआ था। तब से अब तक कई मरीज अस्पताल से स्वस्थ होकर लौट चुके हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि अस्पताल में मरने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। मरने वाले सभी गंभीर श्रेणी के मरीज थे। इस बीच प्लाज्मा थेरेपी में एक उम्मीद दिखी है। अभी तीन दिन पहले ही अस्पताल को प्लाज्मा थेरेपी की मंजूरी मिली है, पर यह थेरेपी किसी भी मरीज पर इस्तेमाल नहीं की जा सकी है। प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना का कहना है कि अमूमन मरीज के ठीक होने के दो हफ्ते के अंदर ही एंटीबॉडी बन जाती हैं। कुछ मरीजों में कोरोना से ठीक होने के बाद महीनों तक भी एंटीबॉडी नहीं बनती। जिन मरीजों के शरीर में एंटीबॉडी काफी वक्त बाद बनती हैं, उनके प्लाज्मा की गुणवत्ता कम होती है, इसलिए आमतौर पर उनके प्लाज्मा का उपयोग कम ही किया जाता है।

देखी जाती है मेडिकल हिस्ट्री

इस काम में चेक लिस्ट के आधार पर डोनर की मेडिकल हिस्ट्री देखी जाती है। तय मापदंड पूरा करने वाला शख्स ही प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। ये देखा जाता है कि व्यक्ति को कोई लंबी बीमारी तो नहीं रही, वह इंसुलिन तो नहीं ले रहा है। या उसे थायरॉइड, किडनी व हार्ट की समस्या तो नहीं है। ये भी पूछा जाता है कि उसकी कोई सर्जरी या कैंसर का इलाज तो नहीं हुआ है।

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अगर किसी डोनर की मेडिकल हिस्ट्री में इनमें से कोई भी समस्या पाई जाती है तो उन्हें प्लाज्मा डोनेट करने के लिए मना कर दिया जाता है। प्लाज्मा डोनेट करने के लिए 18-60 साल के बीच उम्र होना, 50 किलो से ज्यादा वजन होना, प्रेग्नेंसी न होना भी जरूरी है। डोनर में हीमोग्लोबिन की मात्र 12 से ज्यादा होना जरूरी होता है। इसके साथ ही ट्राई डॉट टेस्ट भी किया जाता है, ताकि ये पता चल सके कि डोनर एचआइवी या हेपेटाइटिस से तो पीड़ित नहीं है।

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Posted By: Sunil Negi

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