चारधाम का मान...अटल का सम्मान, उत्तराखंड में अमित शाह ने साधा चुनावी निशाना
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तराखंड राज्योत्सव पर चारधाम, अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान और राज्य आंदोलन का स्मरण किया।


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अश्वनी त्रिपाठी, देहरादून। परेड ग्राउंड का मैदान। अवसर उत्तराखंड राज्योत्सव का, लेकिन विधानसभा चुनाव की आहट के बीच माहौल में सियासत की तपिश पूरी तरह महसूस हो रही थी।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन में भी चुनावी तेवर दिखाई दिए। हालांकि, उन्होंने अपनी बात सत्ता, विकास या चुनावी समीकरणों से नहीं, बल्कि देवभूमि की पावन माटी को प्रणाम कर शुरू की।
हाथ जोड़कर ‘राम-राम’ कहा और ‘नतमस्तक’ होते हुए उत्तराखंड की आस्था को नमन किया। पहले भावनाओं का सिरा थामा, फिर उसी के सहारे भाजपा के राजनीतिक रिश्तों की डोर को मजबूत करने का संदेश दिया।
जो चारधाम नहीं गया, उसके लिए मोक्ष का द्वार नहीं खुलता
गुजरात से उत्तराखंड के आध्यात्मिक रिश्ते का उल्लेख कर कहा कि वहां मान्यता है कि जो चारधाम नहीं गया, उसके लिए मोक्ष का द्वार नहीं खुलता।
इसके बाद बाबा केदार, भगवान बदरी विशाल, मां गंगा और यमुना के उद्गम स्थल, हेमकुंड साहिब और कुंभ की धरती हरिद्वार का स्मरण किया। एक-एक तीर्थ का नाम लेकर कई बार देवभूमि को प्रणाम किया।
यह संबोधन का भावनात्मक पक्ष था, जिसके जरिये उन्होंने उत्तराखंड की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को अपने भाषण का आधार बनाया। लेकिन भाजपा के लिए उत्तराखंड से जुड़ाव का एक सिरा राज्य निर्माण के इतिहास से भी जुड़ता है। शाह ने इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अलग राज्य के लिए हुए संघर्ष और आंदोलनकारियों के बलिदान का स्मरण किया।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को राज्य निर्माण का श्रेय देते हुए कहा कि उन्होंने उत्तराखंड की वर्षों पुरानी पीड़ा और मांग को समझा और राज्य की स्थापना कर उसे साकार किया। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर राज्य आंदोलन के दौरान अत्याचार करने का आरोप लगाकर उन्होंने पुराने राजनीतिक विवाद को भी मंच से फिर जीवित किया। इसके साथ ही कहा कि अटल ने उत्तराखंड बनाया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे संवारने का काम किया है।
शाह ने राज्य स्थापना दिवस को गौरव, सिद्धि और संकल्प के तीन सूत्रों में बांटा। अटल के नेतृत्व में राज्य की स्थापना को गौरव, मोदी और धामी के नेतृत्व में विकास के प्रयासों को सिद्धि तथा सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण और देशभक्ति की परंपरा को बचाए रखने को संकल्प बताया। आंदोलनकारियों और देश की रक्षा में बलिदान देने वालों के सपनों को साकार करने का आह्वान करते हुए युवा पीढ़ी को देशभक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ने का संदेश दिया।
संबोधन के अगले हिस्से में शाह के तेवर राजनीतिक हो गए। उन्होंने कांग्रेस पर मुस्लिम विश्वविद्यालय की वकालत और तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। अवैध मदरसों और मजारों का मुद्दा उठाकर सांस्कृतिक पहचान और अतिक्रमण को बहस के केंद्र में रखा।
इस तरह चारधाम की आस्था से शुरू हुआ संबोधन राज्य आंदोलन की स्मृतियों से गुजरते हुए कांग्रेस पर सीधे राजनीतिक प्रहार तक पहुंचा। विकास के संदर्भ में उन्होंने कुंभ के वैज्ञानिक आयोजन का रोडमैप तैयार करने का श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को दिया और कहा कि त्रिवेंद्र सिंह रावत तथा पुष्कर सिंह धामी ने इसे आगे बढ़ाया।
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