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देहरादून अकरम मुठभेड़: पुलिस की कहानी में कई सवाल, उलझ रही घटना की कड़ियां

Published: Fri, 01 May 2026 01:46 PM (IST)

देहरादून में अकरम मुठभेड़ के बाद पुलिस की कहानी कई सवालों और उलझनों से घिर गई है। अदालत में पेशी ...और पढ़ें

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अंकुर अग्रवाल, देहरादून। प्रेमनगर के पौंधा जंगल में हुई अकरम मुठभेड़ के बाद पुलिस की कहानी अब कई सवालों और उलझनों के बीच घिरती जा रही है।

घटनाक्रम की परतें खुलने के साथ साफ हो रहा है कि मुठभेड़ से पहले और बाद की कई कड़ियां ऐसी हैं, जिनका आपस में तार सहज रूप से नहीं जुड़ रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अकरम को गुरुवार को अदालत में पेश होना था, उसने उससे पहले कथित रूप से लूट जैसी वारदात क्यों की।

पुलिस रिकार्ड के अनुसार, अकरम वर्ष 2014 में नकरौंदा के चर्चित अंकित थपलियाल हत्याकांड के बाद गुजरात भाग गया था। वहां उसने अपनी पहचान बदलकर सलीम नाम से एक ढाबे पर काम करना शुरू कर दिया। उस पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित हुआ और लंबी तलाश के बाद वर्ष 2017 में देहरादून पुलिस ने गुजरात से उसे गिरफ्तार कर वापस लाया।

लगातार बदलता रहा ठिकाने 

गिरफ्तारी के बाद जमानत मिलने पर अकरम फिर उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहा और शामली, मुजफ्फरनगर व सहारनपुर में लगातार ठिकाने बदलता रहा। पुलिस सूत्रों के अनुसार वर्ष 2024-25 में वह देहरादून के पटेलनगर क्षेत्र में भी कुछ समय तक रहा, यानी वह पूरी तरह पुलिस निगाहों से बाहर नहीं था।

अब जबकि उसकी गुरुवार को अदालत में पेशी तय थी, घटनाक्रम यहीं सबसे ज्यादा उलझता है। सवाल उठ रहा है कि यदि वह पेशी के लिए शहर में था, तो फिर उससे कुछ घंटे पहले पौंधा रोड क्षेत्र में लूट जैसी वारदात को अंजाम देने की जरूरत क्यों पड़ी। जिस व्यक्ति को अदालत में उपस्थित होना था, वह खुद ऐसी वारदात कर पुलिस का ध्यान अपनी ओर क्यों खींचेगा, यही बिंदु पूरी कहानी की सबसे कमजोर कड़ी बन रहा है।

पुलिस का दावा है कि पौंधा रोड पर पेट्रोल पंप कारोबारी से नकदी और मोबाइल लूटने के बाद अकरम व उसके साथियों का पीछा किया गया और जंगल में मुठभेड़ हुई। लेकिन यदि अदालत पेशी प्राथमिकता थी तो शहर छोड़ने का सामान्य रास्ता छोड़कर पौंधा जंगल की ओर जाने का फैसला भी सहज नहीं लगता।

2017 में भी राठौड़, अब 2026 में भी राठौड़

घटनाक्रम में पुराना संयोग भी चर्चा में है। वर्ष 2017 में जब अकरम को गुजरात से गिरफ्तार कर दून लाया गया था, उस समय भी प्रेमनगर थाने की कमान नरेश राठौड़ के हाथ में थी।

बल्कि, राठौड़ गिरफ्तारी वाली टीम का हिस्सा थे। अब लगभग नौ वर्ष बाद अकरम फिर उसी थाना क्षेत्र में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया और यह अजब संयोग है कि इस समय भी राठौड़ ही प्रेमनगर के प्रभारी हैं। पुलिस भले इसे संयोग बता रही है, लेकिन यही तथ्य कहानी में एक और परत जोड़ रहा है।

पहले कहा मोबाइल लुट गया, फिर कहा दूसरा मोबाइल था

लूट की घटना से जुड़ा एक और सवाल अब भी बना हुआ है। पुलिस के अनुसार कारोबारी से मोबाइल भी लूटा गया, लेकिन सवाल यह था कि डायल 112 तक उसी ने सूचना कैसे दी। अब पुलिस यह कह रही कि कारोबारी के पास दूसरा मोबाइल भी था।

कौन थे फरार हुए अकरम के दोनों साथी

पुलिस यह भी कह रही है कि अकरम के साथ दो अन्य साथी थे, जो अंधेरे का लाभ उठाकर फरार हो गए। लेकिन वे दोनों कौन थे, पेशी से पहले अकरम उनके संपर्क में कैसे आया और अब तक उनकी पहचान स्पष्ट क्यों नहीं हुई, यह भी जांच का अहम हिस्सा है।

अब अदालत रिकार्ड, सीसीटीवी फुटेज, पोस्टमार्टम रिपोर्ट व काल डिटेल इस कहानी की अगली दिशा तय करेंगे। फिलहाल मुठभेड़ से ज्यादा चर्चा उसकी टूटती कड़ियों और बढ़ती उलझनों की है।

कहानी को उलझाने वाले बड़े सवाल

  • अदालत में पेशी से पहले लूट की वारदात क्यों?
  • यदि पेशी तय थी तो शहर में जोखिम क्यों लिया गया?
  • पौंधा जंगल तक पहुंचने का कारण क्या था?
  • 2017 और 2026, दोनों बार एक ही थाना और वही अधिकारी क्यों चर्चा में हैं?
  • दो फरार साथी कौन हैं?

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