जागरण विमर्शः उत्तराखंड का विकास प्रकृति की देन, आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र: विष्णु प्रकाश त्रिपाठी
दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने जागरण विमर्श में उत्तराखंड के विकास को प्रकृति की अनियोजित व्यवस्था ...और पढ़ें
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जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में उत्तराखंड के विकास पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह पूरी तरह अनियोजित सत्र है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के ब्रोशर में इसकी सूचना नहीं थी और उन्हें संचालक की भूमिका निभाने के लिए अचानक बुलाया गया।
त्रिपाठी ने उत्तराखंड को प्रकृति और सृष्टि का अद्भुत उदाहरण बताते हुए कहा कि यहां की प्राकृतिक व्यवस्था मानव द्वारा किए गए नियोजन का परिणाम नहीं है। शुक्रवार को आयोजित जागरण विमर्श के समापन पर उन्होंने नियोजित और अनियोजित विकास के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि मनुष्य प्रकृति की व्यापकता को नहीं समझ सकता।
उत्तराखंड के पहाड़ों और जंगलों का उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इनमें से किसी का निर्माण किसी विभाग की सुनियोजित वृक्षारोपण योजना से हुआ है? उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के जंगल न केवल प्रदेश के लिए, बल्कि देश के बड़े हिस्से को जीवन और प्राणवायु प्रदान करते हैं।
त्रिपाठी ने कहा कि उत्तराखंड को केवल बिजली के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में ऊर्जा का एक व्यापक आध्यात्मिक अर्थ है और उत्तराखंड इस ऊर्जा का प्रमुख केंद्र है।
उन्होंने उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान को समझे बिना विकास की अवधारणा को अधूरा बताया। यहां चारधाम और प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र होने के कारण, प्रदेश की आध्यात्मिक ऊर्जा को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक उत्तराखंड की मूल पहचान को नहीं समझा जाएगा, तब तक विकास की दिशा स्पष्ट नहीं होगी।
हल्द्वानी के ''शुद्धीकरण'' पर चर्चा करते हुए त्रिपाठी ने सवाल किया कि क्या यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक रूप ले सकता है। उन्होंने मुख्यमंत्री के बयान का संदर्भ देते हुए कहा कि यह घटनाक्रम पहले से नियोजित नहीं था।
उन्होंने कहा कि ''जेन जी'' जैसे शब्दों पर भी चिंता व्यक्त की, जो युवाओं की संभावनाओं को सीमित करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में पीढ़ियों को इस तरह के वर्गीकरण के आधार पर देखने की कोई अवधारणा नहीं है।
हल्द्वानी की रामलीला परंपरा को ''रामत्व'' का केंद्र बताते हुए उन्होंने कहा कि यह कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कौशल और उद्यमिता पर जोर देते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय समाज में व्यक्ति की पहचान उसके कौशल से जुड़ी थी।
उन्होंने पलायन के संदर्भ में कहा कि इसे संभावनाओं की खोज के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बाहर जाकर शिक्षा प्राप्त करना पलायन नहीं, बल्कि विकास है। उन्होंने हिमालय की सुरक्षा के संदर्भ में कहा कि यह केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि यहां के लोगों की निष्ठा से संभव है।
अंत में, उन्होंने उत्तराखंड की पर्वत श्रृंखलाओं की दृढ़ता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रदेश के लोगों का आत्मविश्वास हमेशा ऊंचा रहना चाहिए।
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उन्होंने उत्तराखंड के विकास के लिए प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। संचालन उत्तराखंड के स्थानीय संपादक मनोज झा ने किया।
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