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बागेश्वर में बलिदानी सैनिक के दोबाड़ गांव में सड़क के अभाव में बीमार बुजुर्ग को तीन किमी डोली पर ढोया

Published: Tue, 13 Oct 2026 04:59 PM (IST)

बागेश्वर के दोबाड़ गांव में सड़क न होने के कारण 68 वर्षीय बीमार तुलसी देवी को ग्रामीणों ने तीन किमी ...और पढ़ें

HighLights

  1. बीमार बुजुर्ग को सड़क तक पहुंचाने के लिए तीन किमी डोली पर ढोया।

  2. दोबाड़ गांव में सड़क के अभाव से चिकित्सा सुविधा में बाधा।

  3. बलिदानी के पैतृक गांव में सड़क निर्माण की घोषणा अधूरी।

जागरण संवाददाता, बागेश्वर। पहाड़ में सड़क की अहमियत क्या है, यह दोबाड़ गांव के मिरी तोक में बीमार पड़ी 68 वर्षीय तुलसी देवी को देखकर समझा जा सकता है। पेट दर्द और बुखार से परेशान तुलसी देवी को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को तीन किलोमीटर तक डंडी-कंडी के सहारे पैदल चलना पड़ा।

उम्र के इस पड़ाव पर बीमारी से जूझ रही बुजुर्ग महिला को सड़क तक पहुंचाने की यह मशक्कत पहाड़ के उन गांवों की तस्वीर बयां करती है, जहां आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा ग्रामीणों की पहुंच से दूर है।

ग्रामीण चंचल देव के अनुसार, तुलसी देवी की तबीयत अचानक बिगड़ी थी। गांव के मोहन सिंह, लक्ष्मण सिंह और कल्याण सिंह ने प्लास्टिक की कुर्सी में दो बांस के डंडे बांधकर डोली बनाई।

इसी के सहारे उन्हें तीन किमी पैदल ले जाकर सड़क तक पहुंचाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि सुविधाओं के अभाव में कई परिवार गांव से पलायन कर चुके हैं। रोजगार की तलाश में युवा शहरों का रुख कर चुके हैं, जबकि गांव में बुजुर्ग पुश्तैनी घरों को संभाल रहे हैं।

ऐसे में किसी बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ने पर परिवार और ग्रामीणों के सामने मरीज को अस्पताल पहुंचाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। सड़क तक पहुंचने के लिए कई किमी पैदल चलना पड़ता है।

बलिदानी के गांव में सड़क की आस

दोबाड़ कारगिल बलिदानी मोहन सिंह दानू का पैतृक गांव है। शहादत के बाद उन्हें वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गांव में सड़क निर्माण की घोषणा की थी। इसके बावजूद सड़क की जरूरत अब भी बनी हुई है। पहाड़ में सड़क केवल आवाजाही का साधन नहीं, बल्कि आपात स्थिति में जीवन बचाने वाली बुनियादी सुविधा है।

पलायन के बाद बुजुर्गों के भरोसे पुश्तैनी घर

ग्रामीणों का कहना है कि सुविधाओं के अभाव में गांव के कई परिवार पलायन कर चुके हैं। रोजगार की तलाश में युवा शहरों का रुख कर चुके हैं और गांव में बुजुर्ग ही पुश्तैनी घरों को संभाल रहे हैं। ऐसे में किसी बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ जाए तो परिवार और ग्रामीणों के सामने संकट खड़ा हो जाता है। सड़क तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

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