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अब नौवीं के बच्चे पढ़ेंगे काशी विश्वनाथ मंदिर का गौरवशाली इतिहास, NCERT ने सिलेबस में किया बदलाव

Published: Sun, 04 Oct 2026 07:14 AM (IST)

एनसीईआरटी की कक्षा नौ की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में अब काशी विश्वनाथ मंदिर का गौरवशाली इतिहास पढ़ाया जाएगा।

काशी विश्वनाथ

काशी विश्वनाथ

HighLights

  1. एनसीईआरटी की नौवीं की किताब में काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास।

  2. मंदिर के ध्वंस से पुनर्निर्माण तक का सफर पढ़ाया जाएगा।

  3. छात्र भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर गर्व महसूस कर सकेंगे।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की किताबें अब ज्ञान तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और उसके संघर्षों की अनकही कहानियों से भी नई पीढ़ी का परिचय कराएंगी।

एनसीईआरटी की कक्षा नौ की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक 'अंडरस्टैंडिंग सोसायटी इंडिया ऐंड बियांड पार्ट-2' (अध्याय 3 : रेसिस्टेंस एंड रेजिलिएंस) में काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास को प्रमुखता से जगह दी गई है। यह पुस्तक अगले शैक्षणिक सत्र से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनने जा रही है।

पुस्तक में काशी विश्वनाथ मंदिर के ध्वंस से पुनर्निर्माण तक का सफर पढ़ाया जाएगा। पुस्तक के अनुसार, मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में उनके राजस्व अधिकारी राजा टोडरमल और राजपूत कछवाहा परिवार के प्रमुख राजा मान सिंह द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था।

इतिहास के पन्नों को पलटते हुए यह भी बताया गया है कि आगे चलकर औरंगजेब के शासनकाल में इस मंदिर को ध्वंस कर दिया गया था। सन 1780 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मूल स्थल के ठीक बगल में वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार एवं निर्माण कराया।

पुस्तक में बेहद दिलचस्प तथ्य यह जोड़ा गया है कि 16वीं शताब्दी के बाद आक्रांताओं के हमलों से मंदिरों की रक्षा के लिए समाज ने किस तरह गजब का अनुकूलन किया। दिल्ली, वाराणसी और राजस्थान में कई मंदिरों को कम दृश्य स्थानों और संकीर्ण गलियों में बनाया गया।

इन मंदिरों का बाहरी रूप पारंपरिक मंदिरों जैसा न होकर आम घरों या 'हवेली' जैसा रखा गया, ताकि उनपर आसानी से किसी की नजर न पड़े और वे सुरक्षित रह सकें। काशी विश्वनाथ के अलावा इस पुस्तक में मथुरा के केशव देव मंदिर (राजा वीर सिंह द्वारा संरक्षित), वृंदावन के गोविंद देवजी मंदिर, ऐतिहासिक 'सेंगोल' और भारत की संसद को भी शामिल किया गया है।

क्या कुछ खास है इस नई किताब में

  • प्रारंभिक मध्यकाल में मंदिर समाज और अर्थव्यवस्था के मुख्य स्तंभ थे। ये बड़े पैमाने पर भूमि अनुदान का प्रबंधन करते थे, कारीगरों व पुजारियों को रोजगार देते थे और स्थानीय व्यापारियों को कृषि विकास व सिंचाई के लिए ऋण उपलब्ध कराते थे।
  • शासक अपनी राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने के लिए मंदिरों को संरक्षण देते थे। उदाहरण के लिए, ओडिशा के गज अपने आप को भगवान जगन्नाथ का 'रौता' (प्रतिनिधि) मानते थे, जबकि जयपुर के कछवाहा शासक गोविंददेवजी के नाम पर शासन संभालते थे।
  • मध्यकालीन व्यापार व्यवस्था को समझाते हुए 'हुंडी' का जिक्र किया गया है, जो आधुनिक बैंक चेक की तरह कार्य करती थी। इसे सराफों और उनके एजेंटों के माध्यम से दूर-दराज के इलाकों में सुरक्षित रूप से भेजा जाता था।


छात्र अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व महसूस कर सकेंगे : विशेश्वर

पीएम श्री राजकीय क्वींस कालेज के प्रधानाचार्य विशेश्वर सिंह कहते हैं कि यह पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के संघर्ष, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और समाज की अटूट दृढ़ता के उन अनछुए अध्यायों से रूबरू कराएगी, जिन्हें पढ़कर छात्र अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व महसूस कर सकेंगे। पुस्तक को अगले साल से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की तैयारी चल रही है।

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