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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 29, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Don Subhash Thakur: पांच साल से BHU अस्पताल में भर्ती माफिया सुभाष ठाकुर भेजा गया जेल, यहां बनाना चाह रहा था ठौर

Published: Wed, 29 Jan 2025 12:03 PM (IST)

आजीवन कारावास की सजा काट रहे माफिया सुभाष ठाकुर को पांच वर्ष बाद बीएचयू अस्पताल से फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा ...और पढ़ें

माफिया सुभाष ठाकुर की फाइल फोटो। जागरण
माफिया सुभाष ठाकुर की फाइल फोटो। जागरण

HighLights

  1. दाऊद के करीबी रहे माफिया की अस्पताल में टिके रहने की सारी कोशिशें बेकार
  2. 12 डाक्टरों की टीम ने जांच में स्वस्थ पाया, फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा गया

जागरण संवाददाता, वाराणसी। आजीवन कारावास की सजा काट रहा माफिया सुभाष ठाकुर पांच साल बाद बीएचयू अस्पताल से फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा गया। पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल ने उसके स्वास्थ्य की जांच के लिए 12 डाक्टरों की टीम गठित की थी, जिसे वह पूरी तरह स्वस्थ मिला। पुलिस कमिश्नर ने इसके बाद उसे जेल भेजने का आदेश दिया। हालांकि सुभाष ठाकुर ने जेल नहीं जाने के लिए सभी पैंतरे आजमाए, लेकिन एक नहीं चली।

वाराणसी के फूलपुर के नेवादा गांव का रहने वाला सुभाष सिंह ठाकुर उर्फ सुभाष राय उर्फ बाबा 1990 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड का कुख्यात नाम रहा है और दाऊद इब्राहिम का करीबी था। वह दिसंबर 2019 में किडनी, पेट में संक्रमण और आंख की बीमारी आदि बताकर बीएचयू में भर्ती हुआ और यहीं डेरा जमा लिया। बीते पांच वर्ष में एक एसएसपी, दो पुलिस कमिश्नर बदल गए और मोहित अग्रवाल को 11 माह के कार्यकाल के बाद सुभाष ठाकुर की बनारस में उपस्थिति का पता चला।

पुलिस महानिदेशक, जेल पीवी रामाशास्त्री ने पत्र लिखकर उन्हें माफिया के पांच साल से बीएचयू अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी दी थी। आमतौर पर मेडिकल टीम में तीन डाक्टरों का पैनल होता है, लेकिन सुभाष ठाकुर के लिए बीएचयू मेडिकल कालेज प्रशासन ने अलग-अलग बीमारियों के 12 विशेषज्ञ डाक्टरों का पैनल गठित किया। हालांकि सुभाष ठाकुर अस्पताल से डिस्चार्ज होने के 18 घंटे बाद तक खुद को बीमार बताकर यहीं जमा रहा। वाराणसी पुलिस की सख्ती के बाद उसे फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा जा सका।

सुभाष ठाकुर को अस्पताल से ले जाती पुलिस।- जागरण


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मुंबई के जेजे अस्पताल हत्याकांड में आया था नाम

सुभाष ठाकुर काम की तलाश में मुंबई गया था लेकिन वहां बिल्डरों से रंगदारी वसूलने लगा और सुपारी लेकर हत्याएं कराने लगा। वह दाऊद को बनारस व आसपास के जिलों के ऐसे शूटर उपलब्ध कराता, जिनके नाम पुलिस रिकार्ड में नहीं होते थे। उस समय पूर्वांचल के शूटर किसी वारदात में पकड़े जाते तो महाराष्ट्र पुलिस के शक की सूई सबसे पहले सुभाष ठाकुर की ओर जाती थी।

दाऊद के बहनोई इस्माइल इब्राहिम पारकर की हत्या का बदला लेने सुभाष ठाकुर के गुर्गों ने 12 सितंबर 1992 को मुंबई के जेजे अस्पताल में फायरिंग कर डान अरुण गवली गिरोह के शूटर शैलेश और दो सिपाहियों की हत्या कर दी थी। वर्ष 2000 में मुंबई की अदालत ने इस मामले में उसे हत्या, हत्या का प्रयास और टाडा एक्ट के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

इससे पहले 1993 मुंबई बम ब्लास्ट के बाद सुभाष ठाकुर और दाऊद के संबंध भी टूट गए। उसने 2017 में वाराणसी की कचहरी में दाऊद से अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा मांगी थी।

सुभाष ठाकुर को अस्पताल से ले जाती पुलिस। जागरण


डिस्चार्ज के बाद भी अस्पताल में ठौर चाहता था

माफिया सुभाष ठाकुर का जलवा बीएचयू अस्पताल में भी कायम था। भले ही उसे क्रोनिक बीमारियों ने घेर रखा था, लेकिन सुपर स्पेशियलिटी ब्लाक के नेफ्रोलाजी विभाग में तीसरे तल पर कमरा नंबर 21 में उसे भरपूर सुविधाएं मिली हुई थीं। वह लग्जरी बेड पर सोता था। विभागों में उसकी दहशत थी। उसके कमरे की तरफ जाने के लिए डाक्टरों और पैरामेडिकल कर्मचारियों को कई बार सोचना पड़ता। हर किसी को कमरे के सामने गुजरने से मनाही थी।

पुलिस की खास निगाह रहती और उसे "सुभाष साहब" कहा जाता था। पूरा ब्लाक उसके गुर्गों की निगरानी में रहता था। यही वजह है कि इस अस्पताल में लंबा वक्त गुजार चुका सुभाष नहीं चाहता था कि वह अपने आवंटित कमरे को छोड़कर कहीं और जाए। दो सिपाही कमरे के बाहर बैठे रहते और हर समय कमरा अंदर से बंद रहता था। वह हमेशा आराम की मुद्रा में रहता।

पुलिस कमिश्नर की ओर से गठित 12 डाक्टरों के पैनल ने उसे पूरी तरह स्वस्थ पाया और डिस्चार्ज करने का निर्णय सुनाया। शनिवार को डिस्चार्ज लेटर भी दे दिया गया, लेकिन सुभाष ठाकुर ने अस्वीकार कर दिया। वह लगातार कहता रहा कि स्वस्थ नहीं है, उसे लगातार उपचार की जरूरत है।

बीएचयू के सुपर स्पेशियलिटी ब्लाक में तीसरे तल पर नेफ्रोलाजी विभाग का कमरा नंबर 21, यहीं भर्ती था सुभाष ठाकुर।-जागरण


अस्पताल प्रशासन के अधिकारी उससे अस्पताल से चले जाने का आग्रह करते रहे। रविवार को सुबह सुभाष ने शरीर में फिर से तकलीफ होने की बात कही। उसे इमरजेंसी वार्ड ले जाया गया। दो घंटे तक उपचार और जांच के बाद भी कोई समस्या नहीं मिली तो कमरे में शिफ्ट कर दिया गया।

सोमवार देर शाम पुलिस उसे फतेहगढ़ जेल लेकर चली गई। कमरे में ताला लगाकर चाबी चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय में जमा की गई है। यह कमरा कोविड काल में खाली पड़ा था, लेकिन अब किडनी ट्रांसप्लांट के लिए उपयोग होगा। सुभाष पांच साल से यहां भर्ती था।

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डाक्टरों की मानें तो उसे कई तरह की समस्याएं थीं। डायबिटीज व ब्लड प्रेशर के अलावा किडनी में संक्रमण है। रीढ़ की हड्डी में स्पोंडिलोलिस्थीसिस नामक गंभीर बीमारी है। कमर की हड्डी खिसक चुकी है, जिससे कमर के नीचे का हिस्सा ठीक से काम नहीं कर रहा है। उसे सर्जरी की जरूरत है। वह हाकी स्टिक लेकर चलता है, क्योंकि पैर में ताकत नहीं है। स्पाइन सर्जरी के बाद ठीक होने की संभावना है।

आर्थोपेडिक्स विभाग के डाक्टरों ने सर्जरी की सिफारिश की थी, लेकिन दूसरे विभागों की ओर से सहमति नहीं मिली। न्यूरोलाजी, मानसिक रोग, जरा चिकित्सा, यूरोलाजी और कार्डियोलाजी के डाक्टरों से भी सुझाव लिए जा रहे थे। कई दिनों से हालत सामान्य थी। साढ़े पांच वर्ष में कभी आइसीयू की जरूरत नहीं पड़ी।

पूरी तरह से स्वस्थ होने तक डिस्चार्ज नहीं करने का था आदेश

डाक्टरों के पैनल की मानें तो उसे ऐसी समस्या नहीं है कि अस्पताल में ही भर्ती किया जाए। जेल अस्पताल में भी उसका उपचार किया जा सकता है। कोर्ट का आर्डर था कि उसके पूरी तरह से ठीक नहीं होने तक डिस्चार्ज नहीं किया जाए। वह एसएसबी के एकमात्र आइसोलेटेड रूम में रहता था, तीन शिफ्टों में नर्सिंग स्टाफ उसकी देखरेख करता था।