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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 14, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

दैनिक जागरण पढ़कर फ्रांस में हिंदी में पाया मुकाम, कुछ इस तरह है काशी के नितिन के सफलता की दास्‍तान

By Abhishek sharmaEdited By:
Published: Thu, 14 Jan 2021 03:14 PM (IST)

नितिन बताते हैं कि दैनिक जागरण को पढ़ने से ही हिंदी में काम करने की क्षमता को और बल मिला ...और पढ़ें

नितिन श्रीवास्तव ने बचपन से विदेश में अपनी मेधा का लोहा मनवाने का सपना संजोया और उसे पूरा भी किया।
नितिन श्रीवास्तव ने बचपन से विदेश में अपनी मेधा का लोहा मनवाने का सपना संजोया और उसे पूरा भी किया।

वाराणसी, जेएनएन। वाराणसी के रहने वाले नितिन श्रीवास्तव ने बचपन से ही विदेश में अपनी मेधा का लोहा मनवाने का सपना संजोया और उसे पूरा भी किया। जागरण को बताया कि पिता रमेश कुमार श्रीवास्तव स्टेट बैंक में मैनेजर थे, लिहाजा उनको बचपन से ही किसी प्रकार की बुनियादी सुविधाओं की कमी नहीं थी। बताया कि पढ़ाई-लिखाई करने में अव्वल रहने वाले नितिन खेल-कूद में भी काफी सक्रिय थे। बीते दिनों पेरिस में भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी में निबंध प्रतियोगिता आयोि‍जित की गई थी उसमें नितिन श्रीवास्‍तव को पहला स्‍थान हासिल हुआ है। इस बाबत दूतावास की ओर से भी सोशल मीडिया में जानकारी साझा की गई है। 

क्रिकेट, बास्केटबॉल या फिर वालीबॉल के साथ ही लेखन में भी काफी सफल हैं। शुरूआती शिक्षा बनारस से हासिल करने के बाद बीसीए और एमसीए भी किया और इसके बाद शुरू हुआ सपनों को हकीकत में बदलने का सफर। वर्ष 009 में नितिन ने नोएडा में एचसीएल टेक्नालॉजी से जुड़कर करियर का आगाज किया। इसके बाद वर्ष 2011 में दुबई जा बसे और फिर फ्रांस तक का सफर तय किया। फिलहाल वे एचसीएल कंपनी में पिछले तीन साल से बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 

नितिन के दिल में सात समुंदर पार जाकर मुकाम बनाने की ख्वाहिश थी और देश के साथ ही अपनी जन्‍मभूमि वाराणसी के लिए भी कुछ न कुछ करते रहते हैं। बीते दिनों वाराणसी में रात में लोगों को कंबल ओढ़ाते चर्चा में रहे तो अब फ्रांस में भारतीय दूतावास की ओर से बीते दिनों विश्‍व हिंदी दिवस का आयोजन किया गया तो वहां आयोजित हिंदी में निबंध प्रतियोगिता में भी उन्‍होंने बाजी मारी और पहला स्‍थान हासिल किया। नितिन बताते हैं कि दैनिक जागरण को पढ़ने से ही हिंदी में काम करने की क्षमता को और बल मिला और हिंदी में लेखन और संवरता गया। इसी का परिणाम है कि मुझे फ्रांस में भारतीय दूतावास की ओर से आयोजित हिंंदी प्रतियोगिता में पहला स्‍थान मिल सका।  

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