वाराणसी में मारा गया बृजेश गंजू, नक्सली मुन्ना-अजीत की गिरफ्तारी से टूटा नक्सल नेटवर्क, जंगलों में थमी बंदूकों की गूंज
वाराणसी में नक्सली बृजेश गंझू के मारे जाने से सोनभद्र में नक्सलवाद की पुरानी यादें ताजा हो गईं। मुन्ना विश्वकर्मा ...और पढ़ें

नक्सली बृजेश गंझू की मौत: सोनभद्र में नक्सलवाद का इतिहास और नेटवर्क टूटने की कहानी।
HighLights
वाराणसी मुठभेड़ में बृजेश गंझू की मौत, सोनभद्र में नक्सलवाद की यादें ताजा।
नक्सली मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल की गिरफ्तारी से संगठन कमजोर हुआ।
2012 के बाद सोनभद्र में नक्सली गतिविधियां पूरी तरह समाप्त हो गईं।
जागरण संवाददाता, सोनभद्र। वाराणसी में झारखंड के नक्सली बृजेश गंझू के रविवार की सुबह एटीएस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद पूर्वांचल में नक्सलवाद की सक्रियता की यादें ताजा हो गई हैं। इसमें सर्वाधिक प्रभावित सोनभद्र जिला भी रहा है जहां नक्सली अवैध वसूली और वन उपज पर कब्जा जमाए लंबे समय से बैठे थे।
कभी सोनभद्र के जंगलों में नक्सलियों की बंदूकें गरजती थीं। नगवां, मांची, चोपन और कोन के सीमावर्ती जंगलों से लेकर बिहार-झारखंड की सीमा तक नक्सली संगठन की गतिविधियां पुलिस के लिए चुनौती बनी थीं। चुनाव बहिष्कार के फरमान से लेकर हत्या, पुलिस बल पर हमले और असलहा लूटने तक की घटनाओं ने लंबे समय तक दहशत बनाए रखी।
वर्ष 2002 में नक्सलियों ने नगवां ब्लाक के बिहार सीमा से सटे गांवों में काला झंडा लगाकर विधानसभा चुनाव के बहिष्कार का फरमान जारी किया था। ग्रामीणों को बैठक में बुलाकर किसी दल के पक्ष में मतदान का निर्देश दिए जाने की भी बात सामने आई थी।नक्सलियों के खिलाफ पुलिस और केंद्रीय बलों की कार्रवाई तेज हुई तो धीरे-धीरे संगठन का प्रभाव सिमटने लगा।
सबसे अहम कड़ी हार्डकोर नक्सली कमांडर मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल की गिरफ्तारी बनी। दोनों को कनछ-कन्हौरा जंगल में हुई मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया गया था। मुन्ना पर पांच राज्यों में सक्रिय रहने और 10 लाख रुपये के इनाम की बात सामने आई, जबकि अजीत पर 50 हजार रुपये का इनाम था।
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नक्सलवाद की प्रमुख घटनाओं की टाइमलाइन
2000 : गतिविधियों में तेजी
सोनभद्र की मध्य प्रदेश, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ से लगी सीमाओं के जंगल नक्सली गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील हुए। वर्ष 2000 से जिले में नक्सली गतिविधियां तेज हुईं।
2001 : लालव्रत कोल को मारे जाने का दावा
मिर्जापुर के भवानीपुर में हुई मुठभेड़ में पुलिस ने लालव्रत कोल को मार गिराने का दावा किया था। बाद में उसके जिंदा होने की बात सामने आई। वर्षों बाद वह मुन्ना और अजीत की गिरफ्तारी के बाद पुलिस के हाथ लगा।
2002 : चुनाव बहिष्कार का फरमान
नगवां ब्लाक के बिहार सीमा से लगे गांवों में नक्सलियों ने चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया। संजय कोल, लालव्रत कोल, रामसजीवन उर्फ गुरुजी, मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल समेत अन्य नाम उस दौर की नक्सली गतिविधियों से जोड़े गए।
2003 : सीआरपीएफ की तैनाती
नक्सली गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए सोनभद्र और चंदौली के प्रभावित क्षेत्रों में सीआरपीएफ की तैनाती की गई। सिलहट, मांची, महुली, पोखरिया और कनछ जैसे इलाकों में बल की तैनाती के बाद जंगलों में कांबिंग बढ़ाई गई।
2003 : विजयगढ़ के युवराज की हत्या
विजयगढ़ के युवराज शरदचंद पद्म शरण शाह की गोली मारकर हत्या की घटना ने क्षेत्र में नक्सली दहशत को और गहरा किया। इसके बाद पुलिस-बल की सक्रियता बढ़ी।
20 नवंबर 2004 : हिनौता लैंडमाइन विस्फोट
चंदौली के हिनौता में नक्सलियों ने लैंडमाइन विस्फोट कर पीएसी के वाहन को निशाना बनाया। घटना में 16 पुलिसकर्मी मारे गए और हथियार भी लूटे गए। यह पूरे क्षेत्र की सबसे बड़ी नक्सली घटनाओं में गिनी गई।
2009 : मांची के रामपुर में हत्या
नौ अक्टूबर 2009 को मांची थाना क्षेत्र के रामपुर गांव में शिवप्रकाश उर्फ डब्लू कुशवाहा की हत्या का मामला सामने आया। इस घटना को लालव्रत और मुन्ना से जोड़ा गया था।
2011 : कनछ पहाड़ी में पुलिस-नक्सली मुठभेड़
11 अक्टूबर 2011 को चोपन थाना क्षेत्र में पियरिया माटी से कन्हौरा जाने वाले मार्ग पर कनछ पहाड़ी के पास पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। हालांकि इसके बाद से किसी बड़े नक्सली की गुरफ्तारी नहीं हुई।
24 मई 2012 : कनछ-कन्हौरा मुठभेड़ में बड़ा ब्रेक
पुलिस को सूचना मिली थी कि कनछ-कन्हौरा जंगल में नक्सली किसी गंभीर वारदात की तैयारी में जुटे हैं। एसपी सुभाष चंद्र दुबे के नेतृत्व में पुलिस, एसओजी और सीआरपीएफ की टीम ने जंगल में घेराबंदी की। करीब दो घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने मुन्ना के पास से एसएलआर और 55 कारतूस बरामद करने की बात कही।
27 फरवरी 2012/बाद की कार्रवाई
मुन्ना-अजीत की गिरफ्तारी के बाद लालव्रत कोल की गिरफ्तारी पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी रही । पूछताछ में लालव्रत ने संगठन के कमजोर होने की बात कही थी। हालांकि तब से लेकर आज तक जनपद मे कोई बड़ी घटना नहीं हुई है।
2012 के बाद : गतिविधियों पर विराम
वर्ष 2012 में मुन्ना विश्वकर्मा की गिरफ्तारी के बाद सोनभद्र में नक्सली गतिविधियां पूरी तरह खत्म हो गईं। हालांकि सीमावर्ती जंगलों में समय-समय पर संदिग्ध गतिविधियों को लेकर सुरक्षा बलों ने कांबिंग जारी रखी।
2024 : पुराने मुकदमों में उम्रकैद
मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल को प्रतिबंधित असलहा रखने के मामले में अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। दोनों पर 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। इसी प्रकरण में लालव्रत को अदालत ने दोषमुक्त किया।
2025 : हत्या के मामले में दूसरी उम्रकैद
15 वर्ष पुराने रामवृक्ष हत्याकांड में मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल को फिर उम्रकैद की सजा सुनाई गई। दोनों पर 20-20 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया।
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