संत कबीर नगर में परंपरा बचाने को घूम रहा चाक, आधुनिक सजावटी सामानों ने घटाई मिट्टी के दीयों की मांग
दीपावली नजदीक आने पर बाजारों में रौनक है, लेकिन आधुनिक सजावट के कारण मिट्टी के दीये बनाने वाले कुंभकारों की ...और पढ़ें
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HighLights
आधुनिक सजावट से कुंभकारों की आजीविका पर गहराया संकट।
परंपरा बचाने के लिए आज भी मिट्टी के दीये बनाते हैं।
घटती मांग के बावजूद कुछ ग्राहक उम्मीद का सहारा बने हैं।
द्विजेंद्र पांडेय, पौली। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ गई है। रंग-बिरंगी झालरों और आधुनिक सजावटी सामानों की चमक के बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कुंभकारों की आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है। बाजार की चकाचौंध ने उनके पारंपरिक कारोबार को काफी प्रभावित किया है। इसके बावजूद परंपराओं को जीवित रखने के लिए उनके हाथ आज भी चाक पर मिट्टी के दीये और दीपावली के खिलौने बनाने में जुटे हैं।
कभी कुंभकार परिवारों की दीपावली मिट्टी के दीये और खिलौने बेचकर जगमग हुआ करती थी। हरिराम, रामजस, महेंद्र और सुभाष समेत अन्य कुंभकारों का कहना है कि पहले दीपावली से काफी पहले ही लोग मिट्टी के दीये खरीदने का इंतजार करते थे।
वे गांव-गांव दीये और खिलौने लेकर जाते थे। किसी एक स्थान पर बैठते ही गांव के लोग इकट्ठा हो जाते थे और पैसे या अनाज देकर खरीदारी करते थे। इससे उनकी आजीविका भी चलती थी और लोगों की दीपावली भी मिट्टी के दीयों से रोशन होती थी।
उन्होंने बताया कि समय के साथ बाजार में बिजली की झालरों और तरह-तरह के सजावटी सामानों का चलन बढ़ा है। इससे मिट्टी के बर्तनों और दीयों की मांग घट गई है। अब केवल मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। उनका कहना है कि यदि इसी कारोबार पर निर्भर रहना पड़े तो परिवार चलाना भी कठिन हो जाएगा।
इसके बावजूद मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा से जुड़े लोग आज भी उनसे खरीदारी करते हैं। ऐसे ग्राहक ही उनकी उम्मीद और आजीविका का सहारा बने हुए हैं। पहले की तरह बड़े पैमाने पर काम भले ही नहीं हो रहा है, लेकिन परंपरा को बचाए रखने के लिए वे हर दीपावली पर चाक चलाना नहीं छोड़ते।