300 लड़कों के बीच अकेली दौड़कर यूपी की अंजनी ने मिनी मैराथन में जीता था गोल्ड, अब शिक्षा के लिए लड़ रही हैं जंग
अंजनी मल्लाह ने आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद मिनी मैराथन में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी पहचान बनाई।

मतदान के लिए महिलाओं को जागरुक करती अंजनी मल्लाह
HighLights
आर्थिक तंगी में भी अंजनी ने मैराथन में गोल्ड जीता।
सामाजिक बदलाव के लिए शौचालय और शिक्षा पर जोर।
सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में भी जारी है संघर्ष।
हरिशंकर साहनी, संतकबीरनगर। हौसले बुलंद हों तो मुश्किलें भी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता नहीं रोक सकतीं। इसे सच कर दिखाया है बखिरा क्षेत्र के मेंडरापार गांव निवासी अंजनी मल्लाह ने। उन्होंने आर्थिक तंगी, शादी के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारियों और दो साल की बेटी की परवरिश के बीच भी दौड़ने का जुनून बरकरार रखा। पिता के सपनों को पूरा करने के संकल्प के साथ संघर्ष करती रहीं और मैराथन धाविका के रूप में अपनी पहचान बनाई।
बस्ती जिले के रुधौली क्षेत्र के रानीगांव की अंजनी की शादी वर्ष 2009 में बखिरा क्षेत्र के मेंडरापार में हुई। ससुराल में घर-परिवार के साथ ही दो साल की बेटी की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने न केवल बीए की परीक्षा दी, बल्कि अंतर्जनपदीय प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया।
वर्ष 2012 में हर्रैया में आयोजित मिनी मैराथन में करीब 300 लड़कों के बीच अकेली महिला धाविका के रूप में दौड़कर अंजनी ने गोल्ड मेडल और प्रशस्ति पत्र हासिल किया। यह उपलब्धि उनके संघर्षपूर्ण सफर का अहम पड़ाव बनी। इसी वर्ष कुशीनगर में आयोजित भारत-इंडोनेशिया मैत्री मैराथन में 10वां स्थान प्राप्त कर उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया।
वर्ष 2013 में इंदिरा मैराथन की 42.95 किलोमीटर लंबी दौड़ में 13वां स्थान हासिल किया। इसी साल ओपन इंडियन मैराथन में भी दौड़ पूरी की। शहीद मेजर अभय त्रिपाठी मशाल दौड़ में लखनऊ से कुशीनगर तक मशाल लेकर दौड़ीं।
सात दिसंबर, 2014 को पुणे में आयोजित 29वीं इंटरनेशनल हाफ मैराथन पूरी की। वहीं, वर्ष 2015 में बनबसा में एसएसबी और नेपाल प्रहरी की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय मैत्री दिवस हाफ मैराथन में 21वां स्थान प्राप्त किया।
दौड़ के ट्रैक से गांव की गलियों तक, बदलाव की मुहिम
अंजनी ने खेल के साथ सामाजिक सरोकारों को भी अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया। ससुराल के मेंडरापार गांव में शौचालय निर्माण और खुले में शौच से मुक्ति के लिए ग्रामीणों को जागरूक किया। अपनी मांगों को लेकर जिलाधिकारी से लेकर विधायक और सांसद तक से गुहार लगाई। अब वह शराबबंदी और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्कूल खुलवाने की मुहिम में जुटी हैं
प्रतिभा को प्रोत्साहन का इंतजार
अंजनी का कहना है कि खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उनका दावा है कि वह प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचा चुकी हैं, लेकिन अब तक मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया।
