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संभल में बदला गरीबों का संबल: 70 हजार महिलाओं को रोजगार, 2.24 लाख को सिलेंडर; फिर भी संघर्ष जारी

Published: Sun, 01 Nov 2026 03:04 PM (IST)

संभल में सरकारी योजनाओं ने हजारों परिवारों को सहारा दिया है, जिसमें 70 हजार महिलाओं को स्वरोजगार और 2.24 लाख ...और पढ़ें

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HighLights

  1. 2.24 लाख उज्ज्वला कनेक्शन, 10,751 आवास और 81 हजार का आयुष्मान से उपचार

शिवकुमार कुशवाहा, बहजोई (संभल)। गरीबी से लड़ाई केवल दो वक्त की रोटी जुटाने तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार, पक्की छत, बच्चों की शिक्षा और बीमारी में उपचार की सुरक्षा से भी जुड़ी है। जिले में सरकारी योजनाओं ने इन मोर्चों पर हजारों परिवारों को सहारा दिया है। कहीं महिलाओं को रोजगार मिला तो कहीं परिवारों को आर्थिक सुरक्षा की नई उम्मीद जगी है। फिर भी कुछ परिवारों का संघर्ष जारी है।

राष्ट्रीय स्तर पर विश्व बैंक की रिपोर्ट में 12 वर्षों में भारत के करीब 50 करोड़ लोगों के गरीबी से बाहर हुए हैं, जिसमें जनपद संभल की तस्वीर देखें तो स्वयं सहायता समूहों समय विभिन्न योजनाओं से गरीबों के अंधेरे में योजनाओं का उजाला मिला है।

स्वयं सहायता समूह से 95 हजार महिलाएं जुड़ी हैं, जिनमें 70 हजार महिलाओं को स्वरोजगार मिला है। समूहों के माध्यम से 23,667 परिवारों की आय में वृद्धि हुई है।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 10,751 लाभार्थियों को आवास मिला है, जबकि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 2,24,111 गैस कनेक्शन जारी किए गए हैं।

आयुष्मान भारत योजना के तहत 81,013 लाभार्थियों ने उपचार कराया है, जिस पर 161 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। अंत्योदय योजना के तहत 49,790 परिवारों को निश्शुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है।

इन परिवारों के आयुष्मान कार्ड भी बनवाए गए हैं, ताकि उन्हें स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ मिल सके। दूसरी ओर, जीरो पॉवर्टी अभियान के तहत जिले में 1,400 ऐसे पात्र परिवार चिह्नित किए गए हैं।

जिन्हें गरीबी से बाहर निकालने के लिए सरकारी योजनाओं से जोड़ना बाकी है। आंकड़े बताते हैं कि रोजगार से लेकर आवास और उपचार तक सरकारी मदद का दायरा बढ़ा है, लेकिन योजनाओं का लाभ मिलने भर से गरीबी पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती।

17 साल से टिन की छत के नीचे जिंदगी, गैस कनेक्शन है, सिलिंडर भराने के पैसे नहीं

विकासखंड बहजोई के जैतपुर जैसे गांवों में आज भी परिवार मेहनत-मजदूरी पर निर्भर हैं। वहां करीब 40 प्रतिशत परिवार ईंट भट्ठों पर काम करने के लिए बाहर जाते हैं। 10 से 12 वर्षों में मजदूरी बढ़ने के बावजूद महंगाई के कारण उनकी आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।

ऐसे में गरीबी से बाहर आने की वास्तविक तस्वीर केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि परिवारों की नियमित आमदनी, बच्चों की शिक्षा, पोषण और रहन-सहन में आए बदलाव से सामने आएगी।

गांव की एकता रानी का परिवार आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। करीब 17 साल से ईंटों से बने एक कमरे पर टिन की छत डालकर रह रहीं एकता को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला।

कई बार सर्वे हुआ, नाम स्वीकृत होने की बात भी कही गई, लेकिन पक्की छत का सपना अधूरा है। घर में उज्ज्वला का गैस कनेक्शन है, लेकिन सिलिंडर भराने के लिए पैसे नहीं हैं। तीन बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूल में हो रही है, क्योंकि निजी स्कूल का खर्च उठाना संभव नहीं।

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