अनूठी पहल: इको-फ्रेंडली लक्ष्मी-गणेश की दिल्ली-जयपुर तक मांग, रिटायरमेंट के बाद पूर्व वनाधिकारी ने बदली तकदीर
सेवानिवृत्त वन रेंजर आदित्य त्यागी ने गाय के गोबर से उत्पाद बनाकर 20 से अधिक लोगों को रोजगार दिया है।
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मानकमऊ में गोबर से तैयार लक्ष्मी- गणेश। जागरण
HighLights
सेवानिवृत्त वन रेंजर ने गोबर से उत्पाद बनाना शुरू किया।
20 से अधिक लोगों को रोजगार मिला, स्वरोजगार बढ़ा।
गोबर की लक्ष्मी-गणेश मूर्तियों की दिल्ली-जयपुर में मांग।
दीपक प्रजापति, सहारनपुर। सेवानिवृत्ति को जहां अधिकतर लोग आराम और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मानते हैं, वहीं मानकमऊ निवासी आदित्य त्यागी ने इसे नई शुरुआत का माध्यम बना लिया। वन विभाग में फारेस्ट रेंजर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने गाय के गोबर से विभिन्न उत्पाद बनाने का काम शुरू किया। उनकी यह पहल अब स्वरोजगार के साथ दूसरों को रोजगार देने का भी जरिया बन गई है।
खास बात यह है कि उनके इस काम से 20 से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। दीपावली के मद्देनजर तैयार की गई गोबर की आकर्षक लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां लोगों को खूब पसंद आ रही हैं। दिल्ली और जयपुर से भी उनके पास आर्डर पहुंच रहे हैं।
रोजगार सृजन के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
आदित्य त्यागी ने सेवानिवृत्ति के बाद पारंपरिक सोच से अलग हटकर गोबर को उपयोगी उत्पादों में बदलने का प्रयास किया। गाय के गोबर से बने उत्पादों के माध्यम से उन्होंने पर्यावरण के अनुकूल विकल्प तैयार करने पर जोर दिया। धीरे-धीरे उनके काम का दायरा बढ़ा और इससे अन्य लोगों को भी जुड़ने का अवसर मिला। आज उनकी यह पहल रोजगार सृजन के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रही है।
गोबर से लक्ष्मी-गणेश की सुंदर मूर्तियां
दीपावली के त्योहार को देखते हुए आदित्य त्यागी ने गाय के गोबर से लक्ष्मी-गणेश की सुंदर मूर्तियां तैयार की हैं। आकर्षक रूप और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इन मूर्तियों को बाजार में अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।
स्थानीय स्तर पर मांग के साथ ही दिल्ली और जयपुर जैसे शहरों से भी आर्डर मिल रहे हैं। त्योहार के दौरान इन उत्पादों की बढ़ती मांग ने उनके काम को नई पहचान दी है।
20 से अधिक लोगों के लिए रोजगार का अवसर
आदित्य त्यागी की पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने व्यवसाय को केवल आमदनी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि 20 से अधिक लोगों के लिए रोजगार का अवसर भी बनाया है। उनकी यह कोशिश बताती है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुभव और इच्छाशक्ति के बल पर नई राह बनाई जा सकती है।
गोबर जैसे पारंपरिक संसाधन का रचनात्मक उपयोग कर उन्होंने स्वरोजगार और पर्यावरण हित को एक साथ जोड़ने की मिसाल पेश की है। उनकी पहल उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो नौकरी के बाद नई शुरुआत करना चाहते हैं और समाज के लिए भी उपयोगी काम करना चाहते हैं।
